
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
133 days ago
19.4.2026 जब एक स्त्री और एक पुरुष विवाह के बंधन में बंध जाते हैं। तब वह बंधन दुखदायक भी हो सकता है, और सुखदायक भी। प्रथम पक्ष -- *"यदि वे दोनों अपनी सोच को शुद्ध नहीं रख पाते। एक दूसरे को दबाने का प्रयास करते हैं। दूसरे को अपने से छोटा कम बुद्धिमान एवं कमजोर आदि आदि मानकर जीवन चलाने का प्रयास करते हैं। तब उन दोनों के लिए यह विवाह का बंधन दुखदायक और पराधीनता की अनुभूति कराने वाला होता है।"* द्वितीय पक्ष -- *"परंतु जब वे दोनों बुद्धिमान होते हैं। एक दूसरे को दबाने का प्रयास नहीं करते। दोनों ही एक दूसरे का शोषण करना नहीं चाहते। बल्कि बुद्धिमत्ता से परस्पर पूरक बनते हैं, एक दूसरे की परिस्थितियों और समस्याओं को अच्छी तरह से समझते हैं। एक दूसरे का शुद्ध मन से सहयोग करते हैं। एक दूसरे को समस्याओं से बाहर निकलने में पूरी शक्ति लगाते हैं। तब वह विवाह का बंधन दुखदायक नहीं होता, बल्कि सुखदायक होता है। तब वे दोनों विवाह बंधन में बंधने पर भी, स्वयं को बंधन में अनुभव नहीं करते, पराधीनता का अनुभव नहीं करते। बल्कि एक दूसरे का पूरक अनुभव करते हैं। ऐसे पति-पत्नी स्वयं को स्वतंत्र अनुभव करते हुए सुखी रहते हैं।"* आप भी अपना परीक्षण करें। आपका विवाह संबंध ऊपर बताए दोनों पक्षों में से कौन-सा है? *"यदि पहले वाला हो, तो उसे बदलने का प्रयास करें, और दूसरे पक्ष के अनुसार अपना जीवन चलाने का प्रयत्न करें।" "इससे आपका संबंध मधुर एवं दृढ़ हो जाएगा। आप दोनों पति-पत्नी सुख एवं स्वतंत्रता का अनुभव करेंगे। तभी गृहस्थ जीवन का असली आनंद आएगा, अन्यथा नहीं।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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