
SHREE SHARMA
113 days ago
प्राचीन काल की बात है, एक समृद्ध राज्य के राजमहल के मुख्य द्वार पर एक वृद्ध साधु पधारे। उनकी वेशभूषा फटी-पुरानी थी, लेकिन उनके मुख पर एक गजब का तेज था। उन्होंने द्वारपाल से बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा, "भीतर जाओ और महाराज से कहो कि उनका बड़ा भाई उनसे मिलने आया है।" द्वारपाल असमंजस में पड़ गया। उसने सोचा कि शायद महाराज के कोई आत्मीय संबंधी रहे होंगे, जिन्होंने संसार त्याग कर संन्यास ले लिया हो। उसने तुरंत भीतर जाकर सूचना दी। राजा चतुर और उदार थे। सूचना सुनते ही उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आई। उन्होंने ससम्मान साधु को भीतर बुलाकर अपने बगल वाले सिंहासन पर बैठाया। साधु ने बड़े स्नेह से राजा के सिर पर हाथ रखा और पूछा— "कहो अनुज (छोटे भाई), तुम्हारा राज-काज कैसा चल रहा है? तुम सुखी तो हो?" राजा ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया— "मैं कुशल हूँ भैया, आप अपनी सुनाइए।" साधु ने लंबी सांस भरते हुए कहा— "क्या कहूँ अनुज! जिस महल में मैं वर्षों से रह रहा था, वह अब अत्यंत पुराना और जर्जर हो गया है। उसकी दीवारें हिल रही हैं और वह कभी भी गिर सकता है। मेरे पास बत्तीस नौकर थे, जो दिन-रात मेरी सेवा में रहते थे, वे भी एक-एक कर साथ छोड़ गए। मेरी पाँच रानियाँ थीं, वे भी अब वृद्ध और अशक्त हो गई हैं, अब उनसे कोई काम नहीं संभलता।" यह सुनकर राजा ने मंत्रियों की ओर देखा और साधु को 10 स्वर्ण मुद्राएं देने का आदेश दिया साधु ने उन मुद्राओं को देखा और मुस्कुराते हुए कहा— "राजन्, ये तो बहुत कम हैं। इतने में तो उस महल की मरम्मत भी नहीं होगी।" राजा ने विनम्रता से कहा— "क्षमा करें भ्राता, इस वर्ष राज्य में वर्षा कम हुई है और अकाल की स्थिति है, इसलिए अभी आप इतने से ही संतोष करें।" साधु ने तपाक से उत्तर दिया— "यदि ऐसी बात है, तो मेरे साथ सात समंदर पार चलिए। वहाँ सोने की अगाध खदानें हैं। मेरे सामर्थ्य का अंदाजा आपको है ही, मेरे पैर रखते ही समुद्र सूख जाएगा और स्वर्ण निकालना सुगम हो जाएगा। आखिर मेरे पैरों की शक्ति तो आपने अभी देख ही ली है।" साधु की यह बात सुनते ही राजा खिलखिलाकर हँस पड़े और उन्होंने तुरंत 100 स्वर्ण मुद्राएं साधु की झोली में डाल दीं। साधु प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हुए वहां से चले गए। साधु के जाते ही दरबार में कानाफूसी शुरू हो गई। मंत्रियों और सेनापति ने जिज्ञासावश पूछा— "हे महाराज! हम जानते हैं कि आपका कोई बड़ा भाई नहीं है। फिर आपने उस निर्धन साधु को न केवल भाई माना, बल्कि उसकी ऊटपटांग बातों पर उसे स्वर्ण मुद्राओं से लाद दिया? यह क्या कौतुक है?" राजा ने मुस्कुराते हुए बड़े ही शांत भाव से समझाया: "मित्रों, वह कोई साधारण याचक नहीं, बल्कि एक उच्च कोटि का विद्वान था। उसने जीवन का सत्य दर्शन कराया था:" 1. भाई का नाता: भाग्य के दो ही रूप होते हैं— राजा और रंक। हम दोनों ही विधाता की संतान हैं, इस नाते उसने मुझे भाई कहा। 2. जर्जर महल: उसका आशय उसके वृद्ध शरीर से था। 3. 32 नौकर: ये उसके दांत थे, जो अब टूट चुके हैं। 4. 5 रानियाँ: ये मनुष्य की पाँच ज्ञानेंद्रियाँ (आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा) हैं, जो बुढ़ापे के कारण अब शिथिल हो चुकी हैं। 5. समुद्र का सूखना: जब मैंने उसे केवल 10 सिक्के दिए, तो उसने कटाक्ष किया कि मेरे जैसे वैभवशाली राजा के पास उसके कदम पड़ते ही 'दान का समुद्र' सूख गया। उसने मुझे मेरी सामर्थ्य और उदारता की याद दिलाई। राजा ने आगे कहा— "उसकी वाकपटुता और बुद्धिमानी ने मेरा हृदय जीत लिया। वह मुझे यह सिखा गया कि धन केवल संचय के लिए नहीं, बल्कि पात्र को सम्मान देने के लिए होता है। इसीलिए कल से मैं उसे राज-दरबार का मुख्य सलाहकार नियुक्त करूँगा।" सीख: बुद्धिमत्ता शब्दों के जाल में नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे अर्थों को समझने में होती है।

Comments (7)

SHREE SHARMA
May 9, 2026
धन्यवाद जी🌹🙏🙏

Rama Devi Sahu
May 9, 2026
*🍃🍃🍃🪷राधे राधे 🪷🍃🍃🍃* *सडक कभी भी सीधी नहीं होती, कुछ देर बाद मोड अवश्य आता है..!जिंदगी भी सड़क जैसी है, बस धैर्य के साथ चलते रहें, सुखद मोड अवश्य आयेंगा ..!!!* *थोड़ी फिकर .. थोड़ी क़दर. कभी-कभी खैर खबर, इन छोटी-छोटी बातों का होता है बड़ा असर ...* *मानो तो मौज है.... वर्ना समस्या तो हर रोज है...!!* *🇮🇳इंडिया नहीं भारत कहो 🇮🇳* *जय श्री कृष्ण जी** *सुप्रभात*

Rama Devi Sahu
May 9, 2026
Bahut hi Sundar Story 👌👌 Dhanyawad 🌷 Shubha Shanivar ki Ram Ram Ji 🌹

सविता
May 9, 2026
Radhe radhe 🙏🌹

बरखा शर्मा
May 9, 2026
JAY SHREE KRISHNA JI🙏🌹
