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SHREE SHARMA

349 days ago

मूर्ख को सलाह एक मार्मिक कहानी✍️ बहुत समय पहले की बात है। एक घना और विशाल जंगल था। उस जंगल में तरह-तरह के पेड़-पौधे, बेल-बूटे और झाड़ियाँ फैली हुई थीं। चारों ओर शांति पसरी रहती थी, केवल पक्षियों की चहचहाहट और जानवरों की आवाजें ही वातावरण को जीवंत बनाती थीं। उन्हीं पेड़ों में से एक बड़े पेड़ की ऊँची डाल पर एक नन्ही गौरैया ने अपना घोंसला बनाया हुआ था। वह गौरैया बड़े स्नेह से अपने अंडों की देखभाल करती और दिन भर दाने-पानी की खोज में इधर-उधर उड़ती रहती थी। इसी बीच एक दिन मौसम अचानक बदल गया। शीत ऋतु का आगमन हो चुका था। रात होते-होते ठंडी हवाएँ तेज़ हो गईं और जंगल के हर प्राणी को कंपकंपी छूटने लगी। उसी पेड़ के नीचे कुछ बंदरों का झुंड भी आकर बैठ गया। वे ठंड से बुरी तरह कांप रहे थे और एक-दूसरे से सटे हुए बैठे थे ताकि शरीर की गर्मी से राहत मिले। उनमें से एक बंदर ने दाँत किटकिटाते हुए कहा, “अरे भाइयों! यह सर्दी तो जान लेकर ही मानेगी। अगर हमें कहीं से आग मिल जाती तो हम सब बच जाते।” दूसरा बंदर बोला, “हाँ, यहाँ तो ढेर सारी सूखी पत्तियाँ पड़ी हैं। क्यों न इन्हें इकट्ठा करके आग जलाने की कोशिश की जाए?” सभी बंदरों को यह बात पसंद आई। वे दौड़-दौड़कर सूखी पत्तियाँ और लकड़ियाँ इकट्ठा करने लगे। थोड़ी ही देर में वहाँ एक बड़ा ढेर बन गया। अब वे सोच में पड़ गए कि आखिर इसे जलाएँ कैसे? इसी दौरान, एक बंदर की नज़र अचानक आसमान में उड़ते हुए एक चमकदार जुगनू पर पड़ी। उसकी आँखें चमक उठीं और वह चिल्लाया, “देखो, देखो! यह तो हवा में उड़ती हुई चिंगारी है। अगर हम इसे पकड़ लें और पत्तियों के नीचे रख दें तो आग तुरंत जल उठेगी।” बाकी बंदरों ने भी उसकी बात पर विश्वास कर लिया और सब मिलकर उस जुगनू को पकड़ने के पीछे भागने लगे। पेड़ के ऊपर अपने घोंसले से यह सब देख रही गौरैया को बंदरों की मूर्खता पर दया आ गई। उसने धीरे से कहा, “बंदर भाइयों, यह चिंगारी नहीं है, यह तो एक छोटा-सा जुगनू है। इससे आग नहीं जलेगी। आग जलाने के लिए तुम्हें असली चिंगारी चाहिए।” लेकिन बंदरों ने गौरैया की बात पर ध्यान नहीं दिया। एक बंदर गुर्राकर बोला, “चुप रह मूर्ख चिड़िया! हमें सिखाने की ज़रूरत नहीं है।” इतना कहकर उन्होंने जुगनू को पकड़ लिया और उसे पत्तियों के ढेर के नीचे रख दिया। फिर सभी बंदर बारी-बारी से ढेर पर फूँक मारने लगे, मानो आग किसी भी क्षण जल उठेगी। गौरैया से उनकी यह मूर्खता देखी न गई। उसने फिर से समझाने की कोशिश की, “भाइयों, जुगनू से आग नहीं सुलग सकती। तुम दो पत्थरों को आपस में टकराओ, चिंगारी निकलेगी और वही आग लगा सकती है। लेकिन बंदर इस बार भी नहीं माने। उल्टा वे और चिढ़ गए। एक बंदर ने झल्लाकर कहा, “तेरी अक्ल से हम क्यों सीखें? तू अपने घोंसले में चुपचाप बैठ, वरना अंजाम बुरा होगा। गौरैया को उनकी भलाई की चिंता थी। उसने तीसरी बार धैर्य से कहा, “यदि तुम चाहो तो सूखी लकड़ियों को आपस में रगड़कर भी आग जला सकते हो। बस थोड़ी मेहनत करनी होगी।” लेकिन अब बंदरों का गुस्सा सिर पर चढ़ चुका था। उन्हें अपनी नाकामी का कारण गौरैया की सलाहें लग रही थीं। उनमें से एक बंदर ने क्रोध में भरकर गौरैया को पकड़ लिया और ज़ोर से पेड़ के तने पर पटक दिया। बेचारी नन्ही गौरैया वहीँ तड़पकर प्राण त्याग बैठी?? बंदरों को अपनी गलती का एहसास नहीं हुआ। वे रातभर ठंड से काँपते रहे और सुबह होते ही निराश होकर वहाँ से चले गए। सीख :-- इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि बिना माँगे किसी को सलाह नहीं देनी चाहिए। विशेषकर मूर्ख व्यक्तियों को समझाने की कोशिश करना व्यर्थ है, क्योंकि वे समझते नहीं, उल्टा गुस्सा कर नुकसान पहुँचा देते हैं। इसलिए विवेक यही है कि बुद्धि और ज्ञान का प्रयोग सही समय और योग्य व्यक्ति पर ही किया जाए।

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Comments (3)

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Sep 16, 2025

Jai Shree Ram 🙏 Jai Siya Ram 🙏 Subah ki Mangal Kamanayen ke Sath Suprabhat Jii 🌹 Bhagwan ki Aasirbad Aap pr Sadeib Bani Rahe 🙏 Aap ka Har Pal Subha Mangalmay Ho 🙏🌹🌹

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Sep 16, 2025

Bahut hi Sundar Sikshya Prad Kahani 👌👌 Dhanyawad 🌹🌹🥀🌹🌹