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*गोकुल के नंदभवन में आज एक अनोखी लीला रची गई। कुलगुरु गर्गाचार्य जी पधारे थे। उन्होंने बड़े ही नियम और प्रेम से, केसर-इलायची की सुगंध वाली खीर अपने इष्टदेव श्रीहरि नारायण के लिए बनाई। लेकिन, इधर थाल सजा नहीं, और उधर मौका पाते ही हमारे माखनचोर कन्हैया ने वह प्रेम-भरी खीर चट कर दी!* मैया यशोदा को जब यह पता चला, तो वे तमतमा उठीं। लला को डांटते हुए बोलीं, "अरे ओ नटखट! तुझे घर में खाने को कम पड़ता है, जो गुरुजी की खीर जूठी कर दी?" कन्हैया ने बड़ी मासूमियत से अपनी बड़ी-बड़ी आँखें नचाते हुए तर्क दिया, "मैया, तू नाहक ही मुझे डांटती है। महाराज ने ही तो पुकारा था—आइए, भोग लगाइये!" 'मैं ही तो नारायण हूँ!' गर्गाचार्य जी हैरान होकर बोले, "लाला, मैंने तुझे नहीं, वैकुंठवासी नारायण को आह्वान किया था।" कन्हैया ने तुरंत अपनी बाल-सुलभ चपलता से कहा, "तो बाबा, मैं ही तो हूँ वो वैकुंठवासी नारायण!" मैया ने बात हँसी में उड़ा दी, "चल झूठा! नारायण के तो चार हाथ होते हैं, तेरे कहाँ हैं?" वात्सल्य में डूबी माँ को तो बस अपना दो हाथों वाला, ठुमक-ठुमक चलने वाला लला ही प्यारा था, उन्हें विराट रूप से क्या लेना-देना? हारकर गर्गाचार्य जी ने फिर से खीर बनाई। पवित्र तुलसीदल डाला, आँखें मूँदीं और व्याकुल होकर प्रार्थना की— "हे लक्ष्मीपति! अब तो पधारिये और भोग स्वीकार कीजिये।" इधर कन्हैया ने अपनी योगमाया का खेल रचा और मैया को गहरी नींद में सुला दिया। मैया के सोते ही वे फिर दौड़ पड़े खीर की ओर! भक्त ब्राह्मण की व्याकुलता देख, अंततः भक्तवत्सल भगवान ने अपनी बाल-लीला समेटी। अचानक कुटिया में एक अलौकिक तेज फैल गया। नन्हें कन्हैया की जगह शंख-चक्र-गदा-पद्म धारी साक्षात चतुर्भुज नारायण मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे! उन्होंने कहा— "महाराज! आप जिस नारायण को पुकार रहे थे, वह मैं ही हूँ। आपकी तपस्या सफल हुई।" गर्गाचार्य जी की आँखों से अविरल प्रेमाश्रु बह निकले, वे सुध-बुध खो बैठे। तभी वह विराट ब्रह्म फिर से छोटा सा बालक बनकर उनकी गोद में आ बैठा और अपनी तोतली बोली में कहा, "महाराज, अब आप तो भोजन कर लीजिये।" भक्त का हृदय भर आया, वे गदगद होकर बोले, "प्रभु! आज मैं अपने हाथ से नहीं खाऊँगा। जब मेरे इष्टदेव अपने इन नन्हें-नन्हें हाथों से मेरे मुँह में कौर रखेंगे, तभी मैं यह महाप्रसाद ग्रहण करूँगा।"

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