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एक बार नारद मुनि कठोर तपस्या करके अत्यंत तेजस्वी और ज्ञानी बन गए। उन्हें अपनी भक्ति और वैराग्य पर बहुत गर्व होने लगा। वे सोचने लगे—“अब माया और मोह मुझे कभी प्रभावित नहीं कर सकते।”🚩 जब यह बात विष्णु को पता चली, तो वे मुस्कुराए। भगवान जानते थे कि अहंकार सबसे बड़े ज्ञानी को भी भ्रमित कर सकता है।🚩 एक दिन भगवान विष्णु नारद मुनि को अपने साथ एक सुंदर वन और नगर में ले गए। वहाँ एक अत्यंत रूपवती राजकुमारी का स्वयंवर होने वाला था। जैसे ही नारद मुनि ने राजकुमारी को देखा, उनका मन विचलित हो उठा। वे उसके सौंदर्य पर मोहित हो गए और मन ही मन सोचने लगे—“यदि मेरा विवाह इस राजकुमारी से हो जाए, तो कितना अच्छा होगा!” अब तक जो नारद स्वयं को मोह-माया से दूर मानते थे, वे उसी मोह में फँस चुके थे।🚩 नारद मुनि भगवान विष्णु के पास पहुँचे और बोले—“प्रभु, मुझे ऐसा सुंदर रूप दीजिए कि राजकुमारी स्वयं मुझे ही चुन ले।” भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले—“जैसी आपकी इच्छा…” लेकिन उन्होंने एक लीला रची। उन्होंने नारद को ऐसा रूप दिया, जिसमें उनका चेहरा वानर जैसा हो गया, जबकि नारद को लगा कि वे अत्यंत सुंदर दिख रहे हैं।🚩 नारद मुनि बड़े गर्व से स्वयंवर सभा में पहुँचे। वहाँ उपस्थित लोग उन्हें देखकर हँसी रोकने लगे, लेकिन नारद को कुछ समझ नहीं आया। जब राजकुमारी वरमाला लेकर आई, तो उसने नारद की ओर देखा भी नहीं और सीधे भगवान विष्णु के रूप को ही अपना वर चुन लिया।🚩 सभा समाप्त होने के बाद नारद ने जल में अपना चेहरा देखा। वानर जैसा मुख देखकर वे क्रोध और लज्जा से भर गए। तभी उन्हें समझ आया कि भगवान विष्णु ने यह लीला उन्हें शिक्षा देने के लिए की थी।🚩 नारद का अहंकार टूट गया। उन्होंने भगवान से क्षमा माँगी और समझ गए कि जब तक मनुष्य में अहंकार है, तब तक वह माया से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता। भगवान विष्णु प्रकट हुए और मुस्कुराकर बोले—“सच्चा ज्ञान वही है, जिसमें विनम्रता हो।”🚩 🌟 कथा का सार — अहंकार सबसे बड़े ज्ञानी को भी भ्रमित कर सकता है, माया से बचने के लिए विनम्रता आवश्यक है और भगवान की हर लीला में गहरी शिक्षा छुपी होती है। 🙏 नारायण नारायण🙏 🙏 जय श्रीहरि🙏

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