
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
36 days ago
*देवशयनी एकादशी व्रत कथा ?* *Devshayani ekadashi katha, देवशयनी एकादशी व्रत की कथा: हिंदू धर्म में देवशयनी एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। इस बार देवशयनी एकादशी व्रत 25 जुलाई 2026, शनिवार को है। एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा- हे केशव! आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? इस व्रत की क्या विधि है और किस देवता के पूजन का विधान है? श्री कृष्ण कहने लगे कि हे युधिष्ठिर! जिस कथा को ब्रह्मा जी ने नारद जी को सुनाया था वहीं मैं तुमसे कहता हूं। एक बार नारद जी ने भी ब्रह्मा जी से यही प्रश्न किया था।* *तब ब्रह्मा जी ने उत्तर दिया था कि हे नारद तुमने कलियुगी जीवों के उद्धार के लिए बहुत अच्छा प्रश्न किया है। क्योंकि देवशयनी एकादशी का व्रत सभी व्रतों में उत्तम है। व्रत के पु्ण्य प्रभाव से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।* *ये भी पढ़ें:देवशयनी एकादशी व्रत रखने से क्या फल मिलता है?* *देवशयनी एकादशी व्रत की कथा इस प्रकार है:*⬇️ *प्राचीन काल में मांधाता नाम के एक चक्रवर्ती राजा राज्य करते थे। वे सत्यवादी, धर्मपरायण, महान प्रतापी और प्रजा के हितों के लिए कार्य करने वाले थे। उनके राज्य में प्रजा हमेशा सुखी और धन-धान्य से परिपूर्ण रहती थी। उनके राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ता था।* *1. राज्य में भयंकर पड़ा अकाल:* *एक बार राजा मांधाता के राज्य में लगातार तीन वर्षों तक बारिश नहीं हुई। बारिश नहीं होने के कारण पूरे राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। राज्य में अन्न-जल के अभाव में प्रजा बहुत परेशान रहने लगी। अन्न और जल नहीं होने के कारण राज्य में यज्ञ, हवन, पूजन और धार्मिक अनुष्ठान बंद हो गए, राज्य और प्रजा की इस स्थिति को देखकर राजा अत्यंत चिंतित हो गए। एक दिन प्रजा राजा के पास जाकर कहने लगी कि राजन पूरा प्रजा परेशान हो रही है क्योंकि सृष्टि का कल्याण वर्षा से होता है। वर्षा के अभाव में अकाल पड़ गया है और प्रजा मर रही है। इसलिए हे राजन! कोई ऐसा उपाय बताओ जिससे यह दुख दूर हो सके।* *राजा मांधाता ने प्रजा की बात सुनकर विचार किया कि अगर उन्होंने कभी कोई गलत काम नहीं किया तो, फिर भी उनकी प्रजा को इतनी परेशानी या कष्ट क्यों भोगने पड़ रहे हैं। इस परेशानी का हल खोजने के लिए राजा अपनी सेना के साथ जंगल की ओर निकल पड़े।* *महर्षि अंगिरा के पहुंचे आश्रम वन में घूमते हुए राजा मांधाता ब्रह्मा जी के पुत्र महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुंचे। राजा ने घोड़े से उतरकर महर्षि को प्रणाम किया। महर्षि अंगिरा ने राजा से उनके वहां आने का कारण पूछा। तब राजा ने विनम्र भाव से हाथ जोड़कर कहा कि हे ऋषिवर! मैं हमेशा से ही धर्म का पालन करता आया हूं, फिर भी मेरे राज्य में तीन वर्षों से अकाल पड़ा हुआ है। प्रजा घोर कष्ट में है। राजा के पापों से ही प्रजा को कष्ट होता है, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। कृपया मुझे कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरी प्रजा का कष्ट दूर हो सके। धर्म के अनुसार राज्य में काम करता हूं फिर भी अकाल कैसे पड़ा इसका कारण मुझे अभी तक नहीं मिल सका।* *राजा ने कहा कि मैं आपके पास इसी संदेह को दूर कराने के लिए आया हूं। कृपा मेरे इस संदेह को दूर कीजिए। राजा की बात सुनकर महर्षि अंगिरा ने कहा- "हे राजन्! आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम देवशयनी एकादशी ( हरिशयनी एकादशी) है। यह एकादशी सभी पापों से मुक्ति दिलाने वाली और सब प्रकार की सिद्धियों को प्रदान कराने वाली है। आप अपनी प्रजा और मंत्रियों सहित इस एकादशी का विधि-विधान से व्रत और पूजन करें। भगवान विष्णु की कृपा से आपके राज्य में उत्तम वर्षा होगी और अकाल दूर हो जाएगा।* *राज्य में हुई मूसलाधार वर्षा- महर्षि अंगिरा से व्रत का विधान जानने के बाद राजा मांधाता अपने राज्य वापस लौट आए। उन्होंने आषाढ़ शुक्ल एकादशी पर प्रजा और मंत्रियों के साथ पूरे भक्ति-भाव और श्रद्धा के साथ विधि-विधान से देवशयनी एकादशी का व्रत किया और भगवान विष्णु की उपासना की। राजा से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए। एकादशी का व्रत पूर्ण होते ही राज्य में मूसलाधार बारिश हुई। बारिश के कारण हर तरफ हरियाली छा गई। अन्न और जल की परेशानी दूर हो गई। राज्य की प्रजा फिर से खुशहाल रहने लगी।*

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