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*द्रोणाचार्य ने मुझे सिखाया नहीं क्योंकि मैं क्षत्रिय पुत्र नहीं था।* परशुराम जी ने मुझे सिखाया तो सही परंतु श्राप दे दिया कि जिस वक्त मुझे उस विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, मुझे उसका विस्मरण होगा, क्योंकि उन्हें ज्ञात हो गया की मैं क्षत्रिय हूं। केवल संयोगवश एक गाय को मेरा बाण लगा और उसके स्वामी ने मुझे श्राप दिया जबकि मेरा कोई दोष नहीं था। द्रौपदी स्वयंवर में मेरा अपमान किया गया। माता कुंती ने मुझे आखिर में मेरा जन्म रहस्य बताया भी तो अपने अन्य बेटों को बचाने के लिए। जो भी मुझे प्राप्त हुआ है,दुर्योधन से ही हुआ है। *तो, अगर मैं उसकी तरफ से लड़ूँ तो मैं गलत कहाँ हूँ ? कृष्ण ने उत्तर दिया: *कर्ण, मेरा जन्म कारागार में हुआ। *जन्म से पहले ही मृत्यु मेरी प्रतीक्षा में घात लगाए थी। *जिस रात मेरा जन्म हुआ, उसी रात मातापिता से दूर किया गया। *तुम्हारा बचपन खड्ग, रथ, घोड़े, धनुष्य और बाण के बीच उनकी ध्वनि सुनते बीता। मुझे ग्वाले की गौशाला मिली, गोबर मिला और खड़ा होकर चल भी पाया उसके पहले ही कई प्राणघातक हमले झेलने पड़े।* *कोई सेना नहीं, कोई शिक्षा नहीं। लोगों से ताने ही मिले कि उनकी समस्याओं का कारण मैं हूँ। तुम्हारे गुरु जब तुम्हारे शौर्य की तारीफ कर रहे थे, मुझे उस उम्र में कोई शिक्षा भी नहीं मिली थी। जब मैं सोलह वर्षों का हुआ तब कहीं जाकर ऋषि सांदीपन के गुरुकुल पहुंचा। *तुम अपनी पसंद की कन्या से विवाह कर सके। *जिस कन्या से मैंने प्रेम किया वो मुझे नहीं मिली और उनसे विवाह करने पड़े जिन्हें मेरी चाहत थी या जिनको मैंने राक्षसों से बचाया था। *मेरे पूरे समाज को यमुना के किनारे से हटाकर एक दूर समुद्र के किनारे बसाना पड़ा, उन्हें जरासंध से बचाने के लिए। रण से पलायन के कारण मुझे भीरु भी कहा गया। अगर दुर्योधन युद्ध जीतता है तो तुम्हें बहुत श्रेय मिलेगा। *धर्मराज अगर जीतता है तो मुझे क्या मिलेगा? *मुझे केवल युद्ध और युद्ध से निर्माण हुई समस्याओं के लिए दोष दिया जाएगा। *एक बात का स्मरण रहे कर्ण - *हर किसी को जिंदगी चुनौतियाँ देती है, जिंदगी किसी के भी साथ न्याय नहीं करती। दुर्योधन ने अन्याय का सामना किया है तो युधिष्ठिर ने भी अन्याय भुगता है। *लेकिन सत्य धर्म क्या है यह तुम जानते हो। *कोई बात नहीं अगर कितना ही अपमान हो, जो हमारा अधिकार है वो हमें ना मिल पाए...महत्व इस बात का है कि तुम उस समय उस संकट का सामना कैसे करते हो। *रोना धोना बंद करो कर्ण,जिंदगी न्याय नहीं करती इसका मतलब यह नहीं होता कि तुम्हें अधर्म के पथ पर चलने की अनुमति है। कर्ण के प्रश्न का उत्तर देते हुए, श्रीकृष्ण ने उसे यह समझाया कि उसके प्राणों के दोष केवल उसके स्वयं के कर्मों में नहीं थे, बल्कि उसके अन्यों द्वारा किए गए कर्मों में भी थे। कर्ण के द्वारा किए गए कुछ कर्मों में अवैधता थी, जैसे उसके भ्राता भीष्म और द्रोण के पक्ष में थे जब धर्मयुद्ध हुआ था। उसके अधर्मपूर्ण कर्मों का परिणाम उसे भी झेलना पड़ता था। श्रीकृष्ण ने कर्ण को धर्म के मार्ग पर चलने की सलाह दी और उसे अपने धर्म का पालन करने के लिए प्रेरित किया। श्रीकृष्ण के इस उत्तर से व्याख्यान करते हुए कहा जा सकता है कि श्रीकृष्ण ने कर्ण को उसके अज्ञान के कारण उसके किए गए अधर्म के लिए दोषी ठहराया। श्रीकृष्ण का मत था कि कर्ण को धर्म का अनुसरण करना चाहिए था, लेकिन उसने अपने मित्रों और उसके अज्ञान की प्रेरणा में धर्म के विपरीत कार्य किए। इससे कर्ण ने स्वयं को धर्म के विरोध में पाया, और इस अज्ञान ने उसे उसकी सहायक शक्तियों का सही उपयोग न करने पर मजबूर किया। श्रीकृष्ण ने कर्ण से कहा था, "कर्ण, तुम्हारा एक दोष था और वह था तुम्हारा अज्ञान। तुम्हें पता था कि कौरवों का धर्म और सत्य धर्म का अनुसरण करना था, फिर भी तुम्हारे मानवता की बजाय धर्म के बाद करने के बजाय अधर्म को चुना। तुम्हारा यह अज्ञान तुम्हें कौरवों की साथी के रूप में बनने के लिए मजबूर किया।"

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