
SHREE SHARMA
5 days ago
शिवलिंग पूजा की महिमा, पूर्वकाल के ब्रह्मा विष्णु इन्द्र आदि देवताओं की मृत्यु के बाद शिवभक्त मुनियों को नये देवताओं का पद प्राप्त होना, नन्दीकेश्वर द्वारा धर्मरत नाम के मुनि को भगवान विष्णु का पद प्राप्त होना। भगवान श्रीसदाशिव से नंदीकेश्वर जी से कहते है~ नन्दिकेश महाशैव पश्य पश्य शिवार्चकान् । शिवलिङ्गार्चने तेषां विश्वासः खलु वर्धते ॥ ५२ ॥ श्री सदाशिव बोले: हे महाशैव नन्दिकेश! देखो, जरा इन शिव-आराधकों को देखो। शिवलिंग के अर्चन में इनका विश्वास और निष्ठा निश्चय ही निरंतर बढ़ रही है। लिङ्गपूजनमेतेषां सर्वेषां व्रतमुत्तमत् । तपस्या सफला नूनं लिङ्गार्चनसमन्वयात् ॥ ५३ ॥ इन सभी मुनियों का सबसे उत्तम व्रत शिवलिंग की पूजा करना ही है। शिवलिंग की अर्चना से जुड़ जाने के कारण ही इनकी यह तपस्या निश्चित रूप से सफल हुई है। न केवलेन तपसा केवलैर्बहुभैरपि । दानैर्वा केवलैः प्रीतिः मम लिङ्गार्चनं बिना ॥ ५४ ॥ शिवलिंग की पूजा के बिना, न तो केवल कठिन तपस्या से, न बहुत प्रकार के यज्ञों से और न ही केवल बड़े-बड़े दानों से मुझे वैसी प्रसन्नता (प्रीति) मिलती है। तुल्लिङ्गार्चने प्रीतिः यथा मम सदा तथा । प्रीतिस्तु न भवत्येव वेदपारायणैरपि ॥ ५५ ॥ जैसी मेरी अगाध प्रीति शिवलिंग के अर्चन में सदा रहती है, वैसी प्रीति मुझे केवल वेदों का पाठ या पारायण करने वालों से भी नहीं होती। तुलाकोटिप्रदानैर्वा प्रीतिर्मम न सर्वथा । लिङ्गार्चनाद्यथा प्रीतिः तथा प्रीतिने केनचित् ॥ ५६ ॥ करोड़ों स्वर्ण-तुलादान देने से भी मुझे वह प्रसन्नता सर्वथा नहीं मिलती, जो प्रसन्नता मुझे शिवलिंग की अर्चना से मिलती है; वैसी प्रीति किसी अन्य साधन से संभव नहीं है। भोगकामोऽपि यः पूजां शिवलिङ्गे करिष्यति । तस्मिन्नपि मम स्नेहः स्नेहपालं यतः स मे ॥ ५७ ॥ यदि कोई मनुष्य किसी सांसारिक भोग की कामना (इच्छा) से भी शिवलिंग की पूजा करता है, तो उस पर भी मेरा स्नेह रहता है, क्योंकि वह मेरी शरण में आकर मेरे स्नेह का पात्र बन जाता है। भोगस्तावदभूतपूर्वविभवः संभावितः सर्वदा । लिङ्गाराधनतः स लिङ्गमहिमा ज्ञातो न केनाप्यतः ॥ लिङ्गाराधनतत्पराः सुरपदं संप्राप्य तिष्ठन्त्यमी। कश्चिद्विष्णु रिहास्तु कश्चन विधिः कश्चिन्महेन्द्रोऽधुना ॥ ५८ ॥ शिवलिंग की आराधना से उस जीव को ऐसा अभूतपूर्व भोग और ऐश्वर्य प्राप्त होता है जिसकी सदा संभावना बनी रहती है। इस शिवलिंग की महिमा को पूरी तरह कोई नहीं जान सकता। जो भी शिवलिंग की आराधना में लीन रहते हैं, वे परम देव-पद को प्राप्त करके अमर हो जाते हैं; उन्हीं में से कोई इस समय विष्णु, कोई ब्रह्मा और कोई साक्षात् इन्द्र बनकर विराजमान है। केचित् दिक्पतयो भवन्तु बहवो देवा भवन्तवाश्रमी तदाराः कमलादयोऽपि बहवः तावद्भवन्तु प्रियाः । नक्षत्राणि भवन्तु केचन तथा केचित् ग्रहा एव ते तत्रत्यासुरसंसृतिप्रियतमास्तिष्ठन्तु केचित्तथा ॥ ५९ ॥ (शिव जी कहते हैं:) इस लिंग पूजा के प्रभाव से ही कुछ लोग दिक्पाल (दिक्पति) बनते हैं, बहुत से देवता अपने-अपने आश्रमों या पदों को पाते हैं, और कमला (लक्ष्मी) आदि श्रेष्ठ देवियाँ उनकी प्रिय पत्नियाँ बनती हैं। कुछ लोग नक्षत्र बनते हैं, तो कुछ नवग्रहों के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं, और कुछ इस संसार चक्र में अपनी-अपनी श्रेष्ठ गतियों को प्राप्त करते हैं। इत्युक्तः स महेशेन नन्दिकेशस्तथाऽस्त्विति । प्रेषितः स महेशेन मुनिमण्डलमागतः ॥ ६० ॥ शिवजी द्वारा ऐसा कहे जाने पर नन्दिकेश्वर ने "वैसा ही हो" तथास्तु कहा। फिर महादेव की आज्ञा पाकर वे उन तपस्या करने वाले मुनियों के मण्डल के पास आए। विलोक्य नन्दिकेशं तं धर्मरूपं प्रणम्य ते । तुष्टुवुः पूजयित्वा तं सर्वेऽपि मुनिपुङ्गवाः ॥ ६१ ॥ साक्षात् धर्म के स्वरूप उन नन्दिकेश्वर को आया हुआ देखकर, उन सभी श्रेष्ठ मुनियों ने उन्हें प्रणाम किया, उनकी पूजा-अर्चना की और अत्यंत आदरपूर्वक उनकी स्तुति की। तत्र धर्मरतो नाम कश्चिदासीत् द्विजोत्तमः । तमाह तुभ्यं विष्णुत्वं दत्तमित्यभिनन्दयन् ॥ ६२ ॥ उन मुनियों में 'धर्मरत' नाम के एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे। नन्दिकेश्वर ने उनका अभिनंदन करते हुए उनसे कहा—"तुम्हें (शिवजी की कृपा से) विष्णु का पद प्रदान किया जाता है।" एवं विधित्वमिन्द्रत्वं चन्द्रत्वादीन्यपि स्वतः । दत्त्वा तान् प्रेष्यामास तं तं लोकं मनोहरम् ॥ ६३ ॥ इसी प्रकार नन्दी जी ने अन्य मुनियों को उनकी योग्यता के अनुसार स्वतः ही ब्रह्मा का पद, इन्द्र का पद और चन्द्रमा आदि के पद प्रदान किए, और उन सबको उन-उन मनोहर लोकों में भ

Comments (1)

बरखा शर्मा
Sep 2, 2026
har har mahadev ji🌷🌷
