
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
145 days ago
**फूल देई** उत्तराखंड का एक प्रमुख और बेहद खूबसूरत लोक पर्व है, जिसे **'फसल उत्सव'** या **'फूलों का त्योहार'** भी कहा जाता है। यह त्योहार मुख्य रूप से बसंत ऋतु के आगमन और प्रकृति के आभार के रूप में मनाया जाता है। यहाँ इस त्योहार की कुछ मुख्य विशेषताएं दी गई हैं: ### 1. कब मनाया जाता है? यह त्योहार हिंदू कैलेंडर के अनुसार **चैत्र मास की संक्रांति** (आमतौर पर मार्च के मध्य में) को मनाया जाता है। यह उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। ### 2. मुख्य परंपरा: "फूल देई, छम्मा देई" * इस दिन छोटे बच्चे, जिन्हें **'फूलयारी'** कहा जाता है, सुबह जल्दी उठकर जंगलों और बगीचों से फ्योंली, बुरांश, सरसों और बासिंग जैसे ताजे फूल इकट्ठा करते हैं। * बच्चे गाँव के हर घर की देहरी (doorstep) पर फूल और चावल चढ़ाते हैं। * फूल चढ़ाते समय वे एक पारंपरिक गीत गाते हैं: > *"फूल देई, छम्मा देई,* > *दैणी द्वार, भर भकार,* > *यो देली सौ बार नमस्कार।"* > *(अर्थ: यह देहरी फूलों से भरपूर और क्षमाशील हो, घर के भंडार भरे रहें और इस देहरी को हमारा बार-बार नमस्कार।)* > ### 3. सामाजिक महत्व * **प्रकृति का सम्मान:** यह त्योहार मनुष्य और प्रकृति के गहरे संबंध को दर्शाता है। यह नई फसल और खिले हुए फूलों के स्वागत का प्रतीक है। * **बच्चों की सहभागिता:** इस उत्सव के मुख्य केंद्र बच्चे होते हैं। घर के बड़े बुजुर्ग बच्चों को उपहार के रूप में गुड़, चावल और पैसे देते हैं। ### 4. विशेष खान-पान फूल देई के अवसर पर घरों में विशेष रूप से **'सई'** (Sae) बनाया जाता है। यह चावल के आटे, गुड़ और दही के मिश्रण से बना एक स्थानीय पकवान होता है, जिसे प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। यह पर्व उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पहाड
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
