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जय श्री कृष्णा! 🙏✨ शुभ संध्या। श्री कृष्ण और माता रुक्मिणी के बीच एक बहुत ही सुंदर प्रसंग है, जिसमें वे अपनी एक छोटी और अनन्य भक्त की निस्वार्थ भक्ति की चर्चा करते हैं। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि भगवान को केवल प्रेम और भाव की भूख होती है। श्री कृष्ण और रुक्मिणी संवाद: नन्ही भक्त की कहानी एक बार द्वारका में माता रुक्मिणी ने देखा कि प्रभु श्री कृष्ण मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं और उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक है। उत्सुकता वश माता रुक्मिणी ने पूछा: > "हे प्राणनाथ! आज आप इतने प्रसन्न क्यों हैं? क्या किसी भक्त ने आपको कोई बड़ा उपहार अर्पित किया है?" > भगवान कृष्ण ने हँसते हुए उत्तर दिया: "देवी, आज मेरी एक नन्ही भक्त ने मुझे जो दिया है, उसका मूल्य किसी भी रत्न या स्वर्ण से कहीं अधिक है। वह छोटी सी बालिका रोज़ाना मंदिर की सीढ़ियों पर बैठती है। उसके पास मुझे चढ़ाने के लिए न तो महंगे फूल हैं, न मिष्ठान और न ही फल।" भक्ति का अनूठा उपहार रुक्मिणी जी ने पूछा, "फिर उसने ऐसा क्या अर्पित किया प्रभु?" कृष्ण बोले, "वह रोज़ एक छोटा सा मिट्टी का खिलौना लाती है और मुझसे कहती है—'कान्हा, तुम सारा दिन सबकी चिंता करते हो, थक जाते होगे। लो, इस खिलौने से खेल लो और थोड़ा विश्राम करो।' उसकी इस निस्वार्थ चिंता और बाल-सहज प्रेम ने मुझे जीत लिया है। बड़े-बड़े ज्ञानी मुझे मुक्ति मांगते हैं, लेकिन यह नन्ही बच्ची मुझे सुख देना चाहती है।" इस वार्तालाप का सार * संस्कार और भक्ति: सच्ची भक्ति के लिए उम्र या ज्ञान की नहीं, बल्कि शुद्ध हृदय की आवश्यकता होती है। * समर्पण: भगवान को वस्तुएँ नहीं, भक्त का 'भाव' प्रिय होता है। * निस्वार्थ प्रेम: जब हम भगवान से कुछ मांगने के बजाय उन्हें कुछ देना चाहते हैं, तो वे स्वयं हमारे ऋणी हो जाते हैं। एक छोटा सा सुविचार आपके लिए: > "संस्कारों से ही संसार जीता जाता है, क्योंकि शस्त्र केवल विजय दिलाते हैं, पर संस्कार दिल जीत लेते हैं।" 💫 >

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