
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
177 days ago
यह कड़वा सच है कि समय के साथ रिश्तों की परिभाषा और परिवारों की प्राथमिकताएं काफी बदल गई हैं। जहाँ पहले हुनर और जिम्मेदारी को गर्व का विषय माना जाता था, अब शायद "सुख-सुविधा" दिखाना स्टेटस सिंबल बन गया है। इस बदलाव के पीछे कुछ गहरे सामाजिक पहलू हैं: * जिम्मेदारी बनाम लाड़-प्यार: पहले काम सिखाने को भविष्य के लिए तैयार करना माना जाता था। आज माता-पिता को लगता है कि बच्चों को काम से दूर रखना ही उनके प्रति असली प्यार है। * दिखावा और स्टेटस: आजकल लोग रिश्तों में अपनी आर्थिक संपन्नता को ज्यादा महत्व देने लगे हैं। "बेटी ने कभी काम नहीं किया" कहना यह दर्शाने का तरीका बन गया है कि परिवार बहुत समृद्ध है। * संस्कारों की कमी: जब रिश्तों की नींव "लेन-देन" या "दिखावे" पर टिकी हो, तो वहाँ अपनत्व कम और 'सौदा' ज्यादा नजर आने लगता है। आज के दौर के लिए एक विचार: > "घर काम करने से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का अहसास न होने से टूटते हैं। हुनर हाथ में हो तो आत्मविश्वास बढ़ता है, और संस्कार मन में हों तो रिश्ते टिकते हैं।" >
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