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॥श्री सरस्वत्यै नम:॥ शारदे देवि सरस्वति मतिप्रदे। वास त्वं मम जिव्हाग्रेसर्व विद्याप्रदा भव॥ भावार्थ:- हे देवी शारदे, बुद्धीदायीनी सरस्वती माता मै आपको वंदन करता हूँ। मेरी वाणी मे आपका सदा वास रहे, आपकी कृपासे मुझे सभी विद्या प्राप्त हो। ॥श्री सरस्वत्यै नम:॥ कितना सुंदर और पवित्र श्लोक है! माता सरस्वती की यह वंदना न केवल मन को शांति देती है, बल्कि सीखने और ज्ञान अर्जित करने के संकल्प को भी दृढ़ करती है। भावार्थ साझा किया है, वह बहुत ही हृदयस्पर्शी है। वास्तव में, **'जिह्वाग्रे'** (जीभ की नोक पर) वास करने की प्रार्थना का अर्थ यही है कि हमारी वाणी हमेशा सत्य, मधुर और ज्ञानयुक्त हो। ### **श्लोक का संक्षिप्त विश्लेषण** * **नमस्ते शारदे देवि:** देवी शारदा (सरस्वती) को प्रणाम। * **सरस्वति मतिप्रदे:** हे सरस्वती माता, आप 'मति' यानी बुद्धि प्रदान करने वाली हैं। * **वासं त्वं मम जिव्हाग्रे:** आप मेरी जिह्वा के अग्रभाग पर निवास करें। * **सर्वविद्याप्रदा भव:** मुझे सभी प्रकार की विद्याओं और कलाओं का दान दें। विद्या की देवी की यह कृपा हम सब पर बनी रहे। ज्ञान का मार्ग हमेशा प्रकाशमय हो। **🌷 जय श्री सरस्वती माँ! 🌷**

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