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*🔥अश्वमेध यज्ञ के उपरांत जब माता सीता की पवित्रता पर पुनः लोकापवाद की छाया पड़ी, तब महर्षि वाल्मीकि सीता जी को लेकर सभा में आए। उनके साथ लव और कुश भी थे। समस्त सभा स्तब्ध थी। स्वयं प्रभु श्रीराम की आँखें करुणा से भरी थीं।* `•महर्षि वाल्मीकि ने दृढ़ स्वर में कहा—` "यदि मैंने जीवनभर सत्य और तप का पालन किया है, यदि सीता सर्वथा निष्कलंक हैं, तो मेरे तप का फल इस सत्य की साक्षी बने।" सभा में मौन छा गया। तब जनकनंदिनी सीता ने पृथ्वी माता का स्मरण किया। उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह रही थी, किन्तु मुख पर अद्भुत शांति थी। *🚩सुनि सब बचन सभय सब लोगा।* *भरि आए लोचन प्रेम बियोगा॥* *देखि जनकसुता करुणा भारी।* *रोए नर-नारी सुर नरनारी॥* `•माता सीता ने दोनों हाथ जोड़कर कहा—` "यदि मैंने मन, वचन और कर्म से केवल श्रीराम को ही अपना पति माना है, यदि मैं सर्वथा पवित्र हूँ, तो हे धरती माता! मुझे अपनी गोद में स्थान दो।" तुरंत पृथ्वी विदीर्ण हुई। दिव्य सिंहासन प्रकट हुआ। पृथ्वी देवी स्वयं प्रकट होकर अपनी पुत्री को लेने आईं। *🚩धरनी फाटी भई अति सोहा।* *प्रगटे सिंहासन मन मोहा॥* *भूधरि आई प्रेम अति लाई।* *सुतहि अंक धरि संग बिठाई॥* यह दृश्य देखकर समस्त सभा विलाप करने लगी। लव-कुश स्तब्ध रह गए। महर्षि वाल्मीकि ने भी सीता को रोकने का प्रयास किया। उनके तप, उनके वचन और उनके प्रेम में कोई कमी न थी; किन्तु अब सीता का पृथ्वी में लौटना ही उनकी लीला का अंतिम चरण था। प्रभु राम व्याकुल होकर आगे बढ़े। उनके हृदय में वेदना का अथाह सागर उमड़ पड़ा। *🚩धाए राम बिरह उर भारी।* *देखि जाति सिय रूप पियारी॥* *कर बढ़ाइ रघुनाथ पुकारे।* *"सीते!" बचन प्रेम अति भारे॥* किन्तु समय की धारा रुकती नहीं। पृथ्वी देवी सीता को लेकर धीरे-धीरे धरती में समा गईं। *🚩देखि सकल जग भयउ अधीरा।* *समा गई धरनी महँ सीरा॥* *रहे राम नयनन जल छाए।* *बिरह बाण उर भीतर धाए॥* उस क्षण प्रभु राम भी उन्हें रोक न सके। यह असमर्थता नहीं थी, बल्कि मर्यादा और लीला की पराकाष्ठा थी। भगवान सर्वशक्तिमान होते हुए भी अपनी स्थापित मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते। सभा में ऐसा प्रतीत हुआ मानो करुणा स्वयं रो रही हो। आकाश मौन था, पृथ्वी गंभीर थी और अयोध्या का हृदय टूट चुका था। *🚩सिय बिनु राम चंद्र मन मोरा।* *जिमि बिनु चंद चकोर चकोरा॥* *अमर कथा यह प्रेम अपारा।* *राम-सिया बिछुरन दुख धारा॥* इस प्रकार माता सीता पृथ्वी माता की गोद में समा गईं। महर्षि वाल्मीकि के सत्य, लव-कुश के प्रेम और स्वयं श्रीराम की करुण पुकार के बावजूद यह लीला पूर्ण हुई। यह प्रसंग केवल वियोग की कथा नहीं, बल्कि त्याग, मर्यादा, सत्य और दिव्य प्रेम की अमर गाथा है। *॥ #जय_सीताराम ॥* 🙏🏻🙏🏻🙏🏻 💐💐💐💐💐💐💐💐💐

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