
SHREE SHARMA
21 days ago
।। ॐ नमः शिवाय ।। भगवान शिव को पशुपतिनाथ इसलिए कहा जाता है क्योंकि संस्कृत में "पशु" का अर्थ केवल जानवर नहीं, बल्कि समस्त जीवधारी हैं, वे सभी प्राणी जो मोह, अहंकार, भय और कर्मों के बंधनों में बँधे हुए हैं। "पति" का अर्थ है स्वामी, रक्षक और पालनकर्ता। इसलिए पशुपति का अर्थ हुआ..समस्त प्राणियों के स्वामी। वैदिक और शैव परंपरा में भगवान शिव को संपूर्ण सृष्टि के प्रत्येक जीव का अधिपति माना गया है। शैव दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव तब तक "पशु" है, जब तक वह सांसारिक बंधनों से मुक्त नहीं हो जाता, और उन बंधनों से मुक्ति देने वाले केवल भगवान शिव ही हैं। यही कारण है कि उन्हें श्रद्धापूर्वक पशुपतिनाथ कहा जाता है। येषामीशे पशुपतिः पशूनां चतुष्पदामुत च द्विपदाम्।। भावार्थ- जो समस्त चौपायों और द्विपायों (मनुष्यों सहित सभी प्राणियों) के स्वामी हैं, वही भगवान पशुपति हैं। (यजुर्वेद) इसी सत्य को भगवान शिव का स्वरूप भी दर्शाता है। उनके साथ नंदी बैल, गले में सर्प और उनके आसपास वन्य जीवों का चित्रण केवल अलंकरण नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि शिव किसी एक जाति, वर्ग या केवल मनुष्यों के देव नहीं हैं, बल्कि सृष्टि के प्रत्येक प्राणी पर समान करुणा रखने वाले महादेव हैं। उनका पशुपतिनाथ स्वरूप हमें यह संदेश देता है कि जो प्रत्येक जीव में ईश्वर का अंश देखे, उसी पर भगवान शिव की कृपा सबसे अधिक होती है। इसलिए शिव केवल देवों के देव नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के पालनहार पशुपतिनाथ हैं। ।। श्री पशुपतये नमः ।।

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