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श्रीमद्भगवद्गीता: काव्य सार चतुर्दश अध्याय: गुणत्रयविभाग योग (तीनों गुणों का रहस्य) बोले माधव, "सुनो पार्थ! तुम, परम ज्ञान को आज, जिसे जानकर मुनि सब, पा गए परम स्वराज। सत्त्व, रजस, और तमस, तीन गुण प्रकृति से जात, अविनाशी देही को, देह में बाँधे ये तात।" "सत्त्व गुण निर्मल है, प्रकाशमय और सुखकार, ज्ञान के संग से बाँधे, निष्पाप और बेदार। पर रजस गुण तृष्णा और, आसक्ति का है भण्डार, कर्मों के संग से बाँधे, ये जग का है आधार।" सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः। निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥ (१४.५) सत्त्व, रजस, और तमस ये, तीनों गुण कुन्ती-लाल। बाँधे आत्मा को देह में, फँसायो माया-जाल॥ "तमस गुण अज्ञान से, उपजता है कुन्ती-पुत्र, प्रमाद, आलस, और निद्रा, है इसका मूल सूत्र। सत्त्व बाँधे सुख में, रजस बाँधे कर्म में, पर तमस ज्ञान को ढँक, प्रमाद बाँधे अधर्म में।" "जब सत्त्व गुण की बढ़ती, तब ज्ञान दीप है जलता, और जो मरते उस क्षण, देव लोक है मिलता। रजस की बढ़ती में, कर्मों में मन रमता, और जो मरते उस क्षण, मनुज लोक में जनमता।" रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते। तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥ (१४.१५) रजस में मरें तो कर्म में, जनम पायें इन्सान। तमस में मरें तो मूढ़ योनि, पावें पशु अज्ञान॥ "इन तीनों गुणों को, जो लाँघ है जाता, सच्चा गुनातीत वही, परम पद को है पाता। सम-दुख-सुख और थिर मति, निंदा-स्तुति सम भाव, वही प्यारा है मुझे, जो तजे सब गुणों का प्रभाव।" मिटने लगे अब संशय, पार्थ के घेरे टूटे, गुणों के इस रहस्य में, सुंदर संगम में छूटे। पार्थ! अब तू गुणयोगी बन, निष्काम भाव से युद्ध कर, जगत कल्याण की खातिर, ईश-भक्ति तू जारी कर। तीनों गुण माया के जान, मधु मन में धार ले। गुनातीत हो जाय कर, अपना जन्म सुधार ले॥ जीवन सूत्र: "गुनातीत बनना ही जीवन का लक्ष्य है।" सत्त्व, रजस, और तमस ये तीनों गुण माया के खेल हैं। सत्त्व गुण बंधन को हल्का करता है, लेकिन मोक्ष के लिए हमें इन तीनों गुणों से ऊपर उठना होगा और उस निराकार चेतना (परमात्मा) को पहचानना होगा। #श्रीमद्भगवद्गीता

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