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पाखंड का विसर्जन हलाहल के समान प्राणघातक हैं ये अश्रु, जिन्हें तुम शुचिता का छद्म नाम देते हो, इन कृत्रिम कम्पनों की ओट में छिपकर, तुम निष्ठा का सरेआम आखेट करते हो। यह विलाप केवल एक प्रपंच है, ताकि तुम्हारे प्रत्येक अपराध की कालिमा इन बूंदों में विसर्जित हो जाए, किन्तु यथार्थ तो यह है कि तुम्हारा निरंतर रोना केवल घृणा को ही जन्म देता है। दिखावे की इस बनावटी तड़प ने मेरे अटूट विश्वास के प्राचीर को ध्वस्त कर दिया, तुम वह कुशल मायावी निकले, जो अपनी वेदना का व्यापार कर अपने षड्यंत्रों को सार्थक करते हो। अब द्रवित नहीं होगा यह पाषाण हुआ हृदय, चाहे तुम नयनों से अविरल जलधारा बहा दो, क्योंकि तुम्हारी ही निष्ठुरता ने यह बोध कराया है कि तुम्हारी प्रत्येक बूंद मात्र एक नवीन आघात है। तुम्हारी इस विद्रूप अदाकारी के ये भयानक दृश्य अब सहनशक्ति से परे हैं, तुम वह छली हो, जो अपनी प्रत्येक श्वास में विश्वासघात का विष घोलते हो। विराम दो इस जल के प्रवाह को, कि अब मेरी आत्मा भी तुम्हारी इस धूर्तता से सिहर उठी है, तुम तो वह हो जो स्वजनों की ही जलती चिता पर बैठकर अश्रुओं का दंभ भरते हो। जाओ! इन बनावटी सिसकियों की प्रदर्शनी अब किसी और हाट में लगा लो तुम, क्योंकि मेरा यह खंडित हृदय अब तुम्हें घृणा का निर्णायक प्रणाम देता है।

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