
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
94 days ago
28.5.2026 *"जब आप दूसरे लोगों से बातचीत करते हैं, उनके साथ व्यवहार करते हैं, तो कुछ ही दिनों में प्रायः पता चल जाता है, कि सामने वाला व्यक्ति अच्छा है या बुरा?"* जब आप कुछ परीक्षण करने के बाद यह निर्णय करते हैं, कि सामने वाला व्यक्ति अच्छा है। उसके विचार वाणी व्यवहार सब कुछ सच्चे हैं, और वह सब काम ईमानदारी से करता है, तो *"अनेक बार आप उसे 'अपना मित्र' बना लेते हैं, और उसके साथ एक अच्छा संबंध जीवन भर के लिए बन जाता है।"* कहीं-कहीं इसके अपवाद भी देखे जाते हैं। कुछ लोग आरंभ में तो अपने आप को बहुत अच्छा प्रस्तुत करते हैं। *"परंतु कुछ ही समय में उनकी पोल खुल जाती है, और पता चल जाता है कि यह व्यक्ति अच्छा नहीं है। तब आप उससे संबंध तोड़ देते हैं।"* अब इस विषय में यह जानना चाहिए, कि जब आप किसी दूसरे अच्छे व्यक्ति को उसका परीक्षण करके 'अपना' बना लेते हैं। यह काम तो अपेक्षाकृत सरल है। *"परंतु उस अच्छे व्यक्ति के साथ लंबे समय तक संबंध बनाए रखना, तथा 'अपना' बनाए रखना, यह कठिन पड़ता है।"* क्योंकि यह सामान्य बात है, कि स्वार्थ तो सभी में होता है, किसी में कम और किसी में अधिक। *"किसी में सांसारिक स्वार्थ होता है और किसी में आध्यात्मिक उन्नति करने का स्वार्थ होता है। वह मोक्ष प्राप्ति की इच्छा से परोपकार आदि कर्म करता है। इसलिए जो व्यक्ति सांसारिक स्वार्थ मन में रखता है, उसके साथ संबंध बनाए रखने में अधिक कठिनाई आती है। और जो आध्यात्मिक उन्नति की मन में इच्छा रखता है, (उसे सांसारिक भाषा में निस्वार्थ व्यक्ति कहा जाता है,) उसके साथ लंबे समय का संबंध बनाए रखने में उतनी कठिनाई नहीं होती।"* अतः सोच समझकर लोगों का परीक्षण करके उसके बाद ही किसी के साथ मित्रता आदि संबंध बनाएं। उसे 'अपना' बनाएं। *"जिसमें सांसारिक स्वार्थ कम हो तथा आध्यात्मिक उन्नति का स्वार्थ अधिक हो, ऐसे व्यक्ति के साथ ही यदि आप संबंध बनाएं, तो आप अपना जीवन अधिक सुख पूर्वक जी सकेंगे।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात।"*

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