
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
115 days ago
27.5.2026 बहुत से लोग संसार में सेवा परोपकार आदि अच्छे कर्म करते हैं। लंबे समय तक भी करते हैं।परंतु वे उन अच्छे कर्मों के फल की आशा समाज के लोगों से रखते हैं। कभी-कभी समाज के लोग उन्हें उनके उत्तम कर्मों का फल धन सम्मान आदि दे भी देते हैं। और कभी कभी उनका ध्यान उस ओर नहीं भी जाता, अथवा कम जाता है। *"अथवा कुछ पक्षपाती लोग उन्हें जानबूझकर भी सम्मानित नहीं करते। उनके उत्तम कर्मों का फल नहीं देते। ऐसी स्थिति में वे परोपकारी लोग दुखी हो जाते हैं।"* और कभी कभी तो वे ईश्वर को भी कोसने लगते हैं, कि *"हे ईश्वर! मैं 20-30 वर्षों से देश धर्म समाज की सेवा कर रहा हूं, और मुझे कोई भी व्यक्ति मेरे अच्छे कर्मों का फल ही नहीं दे रहा। तथा आप भी नहीं दे रहे।"* लोग यह शिकायत तो करते हैं कि *"मुझे मेरे उत्तम कर्मों का फल अब तक क्यों नहीं मिला? पर ऐसी बात नहीं कहते, कि 20-30 वर्षों से किए गए मेरे पाप कर्मों का फल मुझे अब तक क्यों नहीं मिला?"* वेद आदि शास्त्रों का संदेश ऐसा है, कि *"ईश्वर न्यायकारी है। वह सब को सदा देखता है। परंतु समय आने पर सबके कर्मों का फल देता है, समय से पहले नहीं। ईश्वर अच्छे कर्मों का अच्छा फल देता है, और बुरे कर्मों का बुरा फल देता है। अतः यदि आपको आपके उत्तम कर्मों का फल अभी तक नहीं मिला, तो समय आने पर अवश्य मिलेगा।"* दूसरी बात -- *"आपको समाज के लोगों से अपने परोपकार आदि उत्तम कर्मों के फल की आशा कम ही रखनी चाहिए। क्योंकि समाज की ओर से आपके उत्तम कर्मों का फल मिल भी सकता है, और नहीं भी। इसका कारण यह है, कि आप उत्तम कर्म करते हुए समाज की नौकरी नहीं कर रहे। आप तो ईश्वर की नौकरी कर रहे हैं। जो व्यक्ति जिस सेठ की नौकरी करता है, तो उसे अपने वेतन आदि फल की आशा भी उसी सेठ से करनी चाहिए, न कि जनता से।"* इस प्रकार से जब आप कोई समाज सेवा परोपकार आदि उत्तम कर्म करते हैं, तो यह ध्यान रहे, कि आप ईश्वर के आदेश का पालन कर रहे हैं, समाज के आदेश का नहीं। आप ईश्वर की नौकरी कर रहे हैं, समाज की नहीं। तो जब आप ईश्वर के आदेश का पालन कर रहे हैं, तो फल की आशा भी उसी से रखनी चाहिए। और ऐसा सोचना चाहिए कि *"यदि मुझे समाज ने कोई फल नहीं दिया, तो फल की क्या चिंता है? मैं समाज की नौकरी थोड़े ही कर रहा हूं। मैं तो ईश्वर की नौकरी कर रहा हूं। ईश्वर समय आने पर मेरे उत्तम कर्मों का फल अवश्य ही देगा। चाहे इस जन्म में दे, चाहे अगले जन्म में दे। वह न्यायकारी है, अवश्य ही फल देगा।"* *"ऐसा सोचने पर फिर आप कभी भी दुखी नहीं होंगे। निराश उदास या चिंतित नहीं होंगे। कभी संशय में नहीं पड़ेंगे कि मेरे उत्तम कर्मों का फल मिलेगा या नहीं मिलेगा?"* इसलिए ईश्वर से ही फल की आशा रखें। वह समय आने पर अवश्य फल देगा। जो लोग ऐसा कहते हैं, कि *"कर्म तो करो, परन्तु फल की इच्छा मत करो।" "यह बहुत बड़ा झूठ है। क्योंकि ऐसा कहने वाले लोग स्वयं भी फल की इच्छा रखते हैं। चाहे समाज फल देवे, चाहे ईश्वर देवे। कोई न कोई तो फल देवे ही। जरा सोचिए, यदि कोई व्यक्ति फल की इच्छा न करे, तो वह कर्म ही क्यों करेगा?"* इसलिए सत्य यही है कि *"व्यक्ति पहले फल की बात सोचता है, उसके बाद ही कर्म करता है।"* जैसे कोई व्यक्ति किसी कंपनी में नौकरी करता है, तो पहले पूछता है, कि *"मुझे वेतन कितना मिलेगा?"* यदि उसे स्वीकार हो, तो ही वह नौकरी करेगा। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है, कि *"बिना फल की इच्छा के कोई व्यक्ति कुछ भी कर्म नहीं करता।"* हां, इतना तो हो सकता है, कि *"कोई व्यक्ति सांसारिक फल धन सम्मान आदि की इच्छा करके कर्म करे, अथवा कोई व्यक्ति मोक्ष फल की इच्छा करके कर्म करे। बिना फल की इच्छा के तो कर्म करना जीवात्मा के लिए असंभव है।"* इसका कारण यह है, कि *"उसमें स्वभाव से बहुत सी कमियां हैं। अपनी उन कमियों को पूरा करने के लिए वह फल की इच्छा करता है।" "आत्मा को बहुत कुछ चाहिए। जैसे उसे धन सम्मान भोजन वस्त्र मकान पुत्र परिवार संपत्ति और घर में काम आने वाले पचासों साधन चाहिएं, और फिर अंत में मोक्ष भी चाहिए। इसलिए वह पहले फल के विषय में सोचता है, उसके बाद ही वह कर्म करता है।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

Comments (2)

सविता
May 27, 2026
bahut sunder v vicharniy katha 🙏🌹

सविता
May 27, 2026
Radhe radhe 🙏🌹
