MyMandirInstall

कैलाश पर्वत पर एक दिन भगवान शिव और माता पार्वती प्रेमपूर्वक वार्तालाप कर रहे थे। हँसी-मज़ाक के उसी मधुर वातावरण में भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए माता पार्वती को "काली" कह दिया। यह शब्द भगवान के लिए केवल एक सरल परिहास था, लेकिन माता पार्वती के कोमल हृदय को यह बात गहराई तक छू गई। उन्होंने कुछ नहीं कहा, पर उनके मन में एक संकल्प जन्म ले चुका था। माता पार्वती ने निश्चय किया कि वे कठोर तपस्या करके अपना गौरवर्ण पुनः प्राप्त करेंगी। उन्होंने कैलाश छोड़ दिया और हिमालय के घने, निर्जन वन में जाकर एक विशाल वृक्ष के नीचे आसन लगा लिया। चारों ओर घना अंधकार, ऊँचे पर्वत, हिंसक पशुओं की गर्जना और भयावह जंगल था, लेकिन माता का मन केवल भगवान शिव के ध्यान में लीन था। उन्होंने अन्न और जल का त्याग कर दिया और वर्षों तक अचल बैठकर तपस्या करने लगीं। उसी वन में एक अत्यंत भयानक आदमखोर शेर रहता था। उसकी दहाड़ सुनकर बड़े-बड़े पशु भी काँप उठते थे। वह अनेक यात्रियों और वनवासियों का शिकार कर चुका था। एक दिन भोजन की तलाश में भटकते हुए उसकी दृष्टि तपस्या में लीन माता पार्वती पर पड़ी। उसे लगा कि आज उसे बिना परिश्रम के आसान शिकार मिल गया है। शेर धीरे-धीरे दबे पाँव माता की ओर बढ़ा। जैसे ही वह उन पर झपटने के लिए आगे बढ़ा, माता की तपस्या से निकल रही दिव्य आभा ने उसे कई हाथ दूर फेंक दिया। शेर कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गया। उसने पहले कभी ऐसी शक्ति का अनुभव नहीं किया था। क्रोध में भरकर उसने दूसरी बार पहले से अधिक वेग से आक्रमण किया। लेकिन इस बार भी वही हुआ। दिव्य तेज की एक अदृश्य दीवार ने उसे फिर पीछे धकेल दिया। उसने तीसरी, चौथी और अनेक बार प्रयास किया, पर हर बार वह असफल होकर दूर जा गिरता। उसके भीतर का अहंकार टूटने लगा, लेकिन भूख अभी भी शांत नहीं हुई थी। आखिरकार उसने निश्चय किया कि चाहे जितना समय लगे, वह इसी स्थान पर रहेगा। उसे विश्वास था कि एक दिन माता की तपस्या अवश्य समाप्त होगी और तब वह उन्हें अपना शिकार बना लेगा। इसी आशा में उसने वहीं अपना डेरा जमा लिया। दिन बीत गए। ऋतुएँ बदलती रहीं। वर्षा आई, कड़ाके की ठंड पड़ी, फिर तपती गर्मी आई। माता पार्वती अचल बैठी रहीं और आश्चर्य की बात यह थी कि वह शेर भी उसी स्थान से कहीं नहीं गया। पहले वह शिकार की प्रतीक्षा करता था, लेकिन धीरे-धीरे माता के दिव्य तेज का प्रभाव उस पर पड़ने लगा। उसकी हिंसा शांत होने लगी। उसकी आँखों का क्रोध धीरे-धीरे विनम्रता में बदलने लगा। वह अब माता की रक्षा करने लगा। कोई हिंसक पशु उस स्थान के निकट आता तो शेर स्वयं उसे भगा देता। वर्षों की तपस्या के बाद पूरा वन दिव्य प्रकाश से भर उठा। आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। देवताओं ने भगवान शिव का स्मरण किया। उसी क्षण भगवान शिव वहाँ प्रकट हुए। उनके दर्शन करते ही माता पार्वती ने नेत्र खोले और विनम्रता से प्रणाम किया। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर कहा, "देवि, तुम्हारी तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। वर माँगो।" माता पार्वती ने कहा, "प्रभु, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे मेरा गौरवर्ण पुनः प्रदान कीजिए।" भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए अपने वरद हस्त से उन्हें आशीर्वाद दिया। उसी क्षण माता का शरीर दिव्य स्वर्णिम आभा से प्रकाशित हो उठा। उनका तेज सहस्र सूर्यों के समान चमकने लगा। उसी दिव्य स्वरूप के कारण वे आगे चलकर गौरी के नाम से विख्यात हुईं। लेकिन तभी माता की दृष्टि उस शेर पर पड़ी जो वर्षों से वहीं बैठा था। अब उसकी आँखों में क्रूरता नहीं, केवल विनम्रता थी। भगवान शिव ने आश्चर्य से पूछा, "देवि, यह वही शेर है जो तुम्हें अपना शिकार बनाना चाहता था।" माता पार्वती मुस्कुराईं और बोलीं, "प्रभु, यह सत्य है कि यह मुझे खाने आया था। लेकिन जितने वर्षों तक मैंने तप किया, उतने ही वर्षों तक इसने भी बिना अन्न-जल के यहीं रहकर प्रतीक्षा की। इसका मन हिंसा से बदलकर समर्पण में परिवर्तित हो चुका है। इसने मेरे तेज के प्रभाव से अपने भीतर के पशु भाव को त्याग दिया है।" भगवान शिव उस करुणा को देखकर प्रसन्न हो गए। उन्होंने कहा, "देवि, तुम्हारा हृदय वास्तव में मातृस्वरूप है। तुम शत्रु में भी सुधार देख लेती हो।" फिर उन्होंने उस शेर की ओर देखा। भगवान के वरद हस्त के स्पर्श से उसका शरीर दिव्य तेज से भर गया। उसकी क्रूरता सदा के लिए समाप्त हो गई। वह विनम्र होकर माता पार्वती के चरणों में बैठ गया। भगवान शिव ने घोषणा की, "आज से यह शेर केवल वन का राजा नहीं रहेगा। यह तुम्हारा दिव्य वाहन बनेगा और यु

Post media

Comments (2)

सविता

सविता

Aug 4, 2026

bahut sunder parsang 🌹🌹

सविता

सविता

Aug 4, 2026

om namah shivay 🙏🌹