
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
139 days ago
14.4.2026 परीक्षा भवन में जब परीक्षार्थी बैठकर परीक्षा देते हैं, तब किसी को यह अनुमति नहीं होती, कि वह दूसरे परीक्षार्थी से बात कर सके। सबको अकेले-अकेले ही अपनी परीक्षा प्रश्नों के उत्तर लिखने होते हैं। *"परंतु जब परीक्षा का परिणाम घोषित होता है, तो उसको सभी लोग जान लेते हैं। वह सबके सामने घोषित होता है। उसकी लिस्ट लग जाती है। कोई भी आकर देख सकता है, कि किसका परिणाम कैसा रहा!"* इसी प्रकार से जब व्यक्ति अपने जीवन में कर्म करता है, अच्छे या बुरे। *"तो क्योंकि वह कर्म करने में स्वतंत्र है, इसलिए किसी भी प्रकार के अच्छे बुरे कर्म कर सकता है। तब चाहे वह अच्छे कर्म करे, चाहे बुरे। उन सारे कर्मों की जिम्मेदारी उस अकेले व्यक्ति पर होती है।" "जैसे वह परीक्षा में उत्तर लिखने में स्वतंत्र होता है, ऐसे ही जीवन की परीक्षा में वह कर्म करने में स्वतंत्र होता है। जैसे परीक्षा में उत्तर लिखने की जिम्मेदारी उसकी अकेले की होती है। ऐसे ही कर्म करते समय भी अच्छे बुरे कर्म करने की सारी जिम्मेदारी उसकी अकेले की होती है।" और "जैसे परीक्षा का परिणाम घोषित होता है, तो वह सबके सामने होता है, केवल उसको अकेले को नहीं बताया जाता। इसी प्रकार से जब जीवन के कर्मों का फल ईश्वर देता है, तो वह सबके सामने होता है, केवल उसी एक व्यक्ति को ही फल की सूचना नहीं होती, बल्कि सबको हो जाती है।"* उस फल को देखकर सब लोग समझ लेते हैं, कि *"इस व्यक्ति ने पहले किस प्रकार के कर्म किए। यदि उसको ईश्वर ने अच्छे मनुष्य का जन्म दिया, तो सब लोग समझ लेंगे कि इसने पिछले जन्म में अच्छे कर्म किए। और यदि उसको पशु पक्षी आदि का जन्म दिया, तो सब लोग समझ लेते हैं कि इसने पिछले जन्म में अवश्य ही कुछ भारी गलतियां की हैं जिसके फल स्वरूप इसको इस बार पशु पक्षी आदि का जन्म मिला है।"* तो सारी बात का सार यह हुआ कि *"सोच समझकर कर्म करें। क्योंकि कर्म की जिम्मेदारी केवल आपकी है, और जब उसका फल ईश्वर देगा तो उसकी जानकारी सब लोगों को हो जाएगी, कि आपने कैसे कर्म किए थे।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
