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Rama Devi Sahu

60 days ago

🙏🌹🌻!!जय श्री कृष्ण!!🌻🌹🙏 जोगनि जोग न जानई, परै प्रेम रस माहिं। डोलत मुख ऊपर लिए, प्रेम जटा की छांहि।। अर्थ: जो जीवात्मा रूपी गोपी या भक्त प्रेम में लीन है, वह योग साधना के कठिन नियमों (आसन, प्राणायाम, वैराग्य) को नहीं जानती। वह पूरी तरह से ईश्वर या प्रियतम के प्रेम रूपी रस में डूब चुकी है। वह हर समय अपने चेहरे पर एक अजीब सी मस्ती, आनंद और प्रियतम की याद लिए घूमती रहती है। जैसे योगी अपनी जटाओं की छाया में बैठते हैं, वैसे ही इस प्रेमी भक्त ने सांसारिक बंधनों को छोड़कर ईश्वर के "प्रेम रूपी जटाओं" की शीतल छाया का आश्रय ले लिया है। मुख्य संदेश: ईश्वर को पाने के लिए कठिन योग साधना, तपस्या या ढोंग की आवश्यकता नहीं है। सच्चा और निश्छल प्रेम ही ईश्वर तक पहुँचने का सबसे आसान और सबसे आनंदमयी मार्ग है। जब व्यक्ति प्रेम रस में डूब जाता है, तो उसे किसी अन्य साधना की सुध नहीं रहती। 🙏🌹🌻!!जय श्री कृष्ण!!🌻🌹🙏

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