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Rama Devi Sahu

125 days ago

हिंदू पुराणों में वर्णित कामधेनु, जिन्हें सुरभि भी कहा जाता है, स्वर्ग की दिव्य गौ मानी जाती हैं। उन्हें समस्त गौवंश की जननी तथा समृद्धि, ऐश्वर्य और धर्म की प्रतीक माना गया है। पुराणों के अनुसार उनके शरीर में अनेक देवताओं का निवास बताया गया है, इसलिए भारतीय संस्कृति में गौ को अत्यंत पवित्र माना जाता है। समुद्र मंथन से प्रकट हुई दिव्य गौ पुराणों के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तब उस अमृतमंथन से अनेक दिव्य रत्न प्रकट हुए। उन्हीं दिव्य रत्नों में से एक सुरभि अर्थात कामधेनु भी थीं। यह दिव्य गौ स्वर्गलोक में देवताओं के लिए यज्ञों में आवश्यक घृत और समस्त समृद्धि प्रदान करती थीं। महर्षि वशिष्ठ और कामधेनु की कथा एक अन्य प्रसिद्ध कथा के अनुसार कामधेनु महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में निवास करती थीं। वे अपनी दिव्य शक्ति से ऋषि के लिए भोजन, धन, वस्त्र और आवश्यक वस्तुएँ उत्पन्न कर देती थीं। एक बार राजा विश्वामित्र अपने सैनिकों के साथ वन से गुजरते हुए वशिष्ठ के आश्रम पहुँचे। उन्होंने कामधेनु की अद्भुत शक्तियाँ देखीं और उसे प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की। परन्तु वशिष्ठ ने कहा कि यह गौ देवताओं का दिव्य वरदान है, इसलिए इसे दिया नहीं जा सकता। क्रोधित होकर विश्वामित्र ने बलपूर्वक कामधेनु को ले जाने का प्रयास किया। तब कामधेनु ने अपनी दिव्य शक्ति से अपने शरीर से असंख्य योद्धाओं को उत्पन्न किया, जिन्होंने आश्रम की रक्षा की और विश्वामित्र की सेना को पराजित कर दिया। इस घटना से प्रभावित होकर विश्वामित्र ने समझ लिया कि आध्यात्मिक शक्ति राजसत्ता से भी महान होती है, और उन्होंने तपस्या का मार्ग अपनाया। कामधेनु का दिव्य स्वरूप पुराणों में कामधेनु को श्वेत वर्ण की दिव्य गौ के रूप में चित्रित किया गया है, जिनके शरीर में देवताओं का निवास बताया गया है। कई चित्रों में उनके साथ बछड़ा, पंख या दिव्य आभा भी दिखाई जाती है, जो उनकी स्वर्गीय प्रकृति को दर्शाती है। गावो विश्वस्य मातरः सर्वदेवमयीः स्मृताः। यासां प्रसादात् सिद्ध्यन्ति सर्वे कामा न संशयः॥ अर्थ – गौ को विश्व की माता और सभी देवताओं का निवास कहा गया है। उनके आशीर्वाद से मनुष्य की सभी शुभ कामनाएँ पूर्ण होती हैं। इस प्रकार कामधेनु केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि धर्म, समृद्धि, पोषण और मातृत्व का दिव्य प्रतीक हैं।

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