
Rama Devi Sahu
3 days ago
मन को साध लेना ही साधना है। जिसका मन वश में नहीं है वही तो बेबस है। मनुष्य मन का स्वभाव जानने के लिए गीता जी का ये सूत्र अवश्य समझ लेना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता जी में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि ये मन बड़ा ही चंचल, प्रमथ स्वभाव वाला, दृढ़ और बलवान है। इसलिए इसे रोकना वायु को रोकने जैसा है। मन ना तो कभी तृप्त होता है और ना ही एक क्षण के लिए शांत बैठता है। यह अभाव और दुःख की ओर बार- बार ध्यान आकर्षित कराता रहता है। अपमान ना होने पर अकारण ही यह अपमान होने का अहसास कराता है। मन सदैव अहम का पोषण चाहता है, जहाँ मनुष्य के अहम को ठेस पहुँचती है वहीं मन दुःखी हो जाता है। अशांति कहीं और से नहीं आती, भीतर से आती है, इसका जन्मदाता मन है। जिसने मन को साध लिया वही तो मुनि है। निरन्तर अभ्यास से इस मन को नियंत्रित किया जा सकता है। जो भीतर शांत है उसके लिए बाहर भी सर्वत्र शांति ही है। आपका दिन मंगलमय हो। 🌷😊🙏
Comments (2)

Rama Devi Sahu
Nov 4, 2026
जब जीवन की नाव में खुद श्री कृष्ण सारथी बन जाएँ, तो फिर तूफानों से डर कैसा… मंज़िल की चिंता कैसी। बस भरोसा रखिए अपने माधव पर। ❤️🙏 मेरी हर मुश्किल का एक ही सहारा… मेरे श्री कृष्ण। 🦚 राधे राधे ❤️🙏

Jaganath Singh
Nov 4, 2026
🙏🌹🙏 Radhe Radhe 🙏🌹🙏 Have a nice day 🌹
