
Rama Devi Sahu
70 days ago
. *श्री राधा कृष्ण चरित्र भाग २९२* *श्री राधा लीलामृतम् भाग २९२* वज्रनाभ ! तुम्हारा यह देश काल तो सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के मन की कल्पना ही तो है ........ब्रह्मा जी के मन में ही ये सब है .......कह सकते हो ये सब ब्रह्मा जी का सपना है । महर्षि बोलते गए ........आज भाव जगत से बाहर आही नही पा रहे महर्षि शाण्डिल्य । पर अवतारकाल में उन्हीं युगल की इच्छा से लीला और लीला परिकर सब प्रकट हो जाता है.........लम्बी साँस ली महर्षि नें .......... अब अवतारकाल समाप्त हो गया है .........युगल निकुञ्ज में प्रवेश कर चुके हैं ........हाँ अवतारकाल में सबको सुलभ थे युगल .......पर अब जो प्रेम से सिक्त हैं........वही युगलवर का है । महर्षि शाण्डिल्य किसी और लोक की बात करनें लगे थे .........हाँ पहले तो वो 'गोलोक धाम" में ही पहुँच गए थे......और........ मनसुख अभी तक तू सोया है ? .....ब्रह्ममुहूर्त का समय हो गया .......उठ । मनसुख अपनी माता पौर्णमासी के पास कभी सोया ही नही ........... सब गोपियाँ इसको स्नेह देती हैं ............ उनके पुत्र मनसुख को छोड़ते नही हैं .......इसलिए ये किसी भी ग्वाल सखा के यहाँ सो जाता है ........ अब उठो......जाना नही हैं ......कहीं कन्हैया उठ गया तो ! अरे ! पहले हमें जाना चाहिए नन्दभवन में ........ क्या ब्रह्म मुहूर्त हो गया ? ............ चलो फिर ............ मनसुख तो कन्हैया का नाम सुनते ही गहरी नींद में भी उठ जाता है । अरे ! स्नान नही करोगे मनसुख ? यमुना में कन्हैया के साथ ही स्नान होगा । वो तो चल दिया .................... नन्दभवन में भीड़ लगी है .................. ग्वाल बाल सब खड़े हैं । तभी नन्द भवन का द्वार खुला .................... क्यों बालकों ! तुम्हे नींद भी आती है या नही ? सुबह ब्रह्ममुहूर्त भी हुआ नही ....... कि आगये ! मैया यशोदा आगयीं थीं......और स्नेह मिश्रित डाँट लगा रही थीं । हम कुछ कह तो रहे नहीं हैं ............ सोनें दे मैया कन्हैया को .......बस हमें एक बार देखनें दे .............मनसुख कहाँ माननें वाला था......भीतर ही चला गया............ देख ! उठाना नही ............. मनसुख ! मारूँगी तुझे.......मैया यशोदा गाल में हल्की चपत देती हैं मनसुख के । पर कन्हैया जाग गए ......... मनसुख ! कन्हैया नें जागते ही कहा। मैया ! मैने नही जगाया है .......ये स्वयं जागा है .............. भाग यहाँ से ...........अभी तो उजाला भी नही हुआ ........... कलेवा करेगा मेरा लाला ........फिर स्नान करके ........... तैयार होकर आएगा .........जाओ तुम लोग । मैया नें भगा दिया मनसुख को...... पर बड़ा विचित्र है ये तो, जाते जाते बोला .......कन्हैया ! .हम सब बाहर हैं .....जल्दी आजा । अब भला कन्हैया का मन लगेगा ! ............. जल्दी करके ..............माखन रोटी खाकर ..............घुँघरालें केशों को मैया नें संवार दिया है ................ नीले रँग में पीली पीताम्बरी ........ मोर मुकुट .........हाथ में लकुट ........... फेंट में बाँसुरी ............... उफ़.......क्या रूप है............ महर्षि आगे कुछ बोल न सके ............... गोलोकधाम की ये लीलाएं नित्य ऐसे ही चलती रहती हैं .......ये नित्य धाम है । ये बात आनन्दातिरेक में बोले...... ........फिर महर्षि भाव सिन्धु में डूब गए थे । ************************* एक दिव्य तेज़ यमुना में छा गया था अचानक ................ उद्धव जी प्रकट हो गए थे.........हाँ प्रेमी भक्त उद्धव जी । निकुंजेश्वरी श्रीराधारानी नें ही कृपा की है उद्धव जी पर ....... इन्हें वृन्दावन धाम वास दिया है ......... कृष्ण चन्द्र जू की आज्ञा से ये बद्रीनाथ गए तो ......पर इनका मन नही लगा ........आगये " कुसुम सरोवर" के निकट ................ आज महर्षि शाण्डिल्य की ये स्थिति देखकर ...... भावातिरेक में महर्षि ........... तो प्रकट हो गए थे उद्धव जी ........... पर उद्धव जी के साथ ये कौन था? श्याम सुन्दर ? वज्रनाभ आनन्दित हो उठे ........ नही! मैं श्याम सुन्दर नहीं मैं यमुना हूँ। हाँ कालिन्दी यमुना। श्याम सुन्दर का चिन्तन करते हुए मेरा रूप भी श्याम सुन्दर जैसा ही हो गया है यमुना नें बताया। पर आप प्रसन्न हैं .........क्या आपको श्याम सुन्दर का विरह व्याप नही रहा ..............वज्रनाभ नें पूछा। नहीं .........मेरे ऊपर श्रीराधारानी की विशेष कृपा है ..............उन्हीं नें मुझे कभी श्याम सुन्दर का विरह होनें ही नही दिया .........वो मेरे साथ ही हैं ............यहीं हैं ............. अभी हैं । वज्रनाभ कुछ बोल न सके ............. साष्टांग प्रणाम किया श्री यमुना रसरानी को ......और उद्धव जी को भी । क्रमशः *जय जय श्री राधे कृष्ण*
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