MyMandirInstall
Profile

Rama Devi Sahu

153 days ago

एक दिन नन्हे कन्हैया को बड़ी ज़िद चढ़ गई— “मइया… मैं तो आज अपना चित्र बनवाऊँगो!” यशोदा मैया मुस्कुराई— “लल्ला, चित्र बनवाय के का करैगो?” कान्हा ने भोलेपन से सिर हिलाया— “मइया, मोय कछू नै पता… पर मैं तो बनवाऊँगो ही!” मईया लाड़ में हार गई और कन्हैया को लेकर गई एक चित्रकार स्त्री के पास, जिसका नाम था चित्रा। चित्रा ऐसी कलाकार कि जिसका चित्र बना दे तो असली और नकली में भेद करना कठिन हो जाए। पर चित्रा ने कान्हा को पहले कभी देखा ही न था। जैसे ही उसने नन्हे श्यामसुंदर को देखा— बस… देखती ही रह गई। उसका मन, उसकी दृष्टि, उसकी चेतना—सब उसी बाल स्वरूप में खो गई। वो नन्ही मुस्कान, वो चमकती आँखें, वो चपलता… चित्रा की आत्मा मानो पहली ही नज़र में कृष्णमय हो गई। यशोदा मैया ने धीरे से चिकोटी काटी तो चित्रा की तन्द्रा टूटी। उसने कान्हा को बैठने कहा, पर कन्हैया… कभी टेढ़े खड़े हो जाएँ, कभी एक पैर पर टिक जाएँ, कभी हँसकर मुड़ जाएँ! चित्रा बोली— “लल्ला, सीधा खड़े हो जाओ…” कन्हैया ने माखन-सी बात कही— “अगर मोरो चित्र बनानो है, तो जैसे हूँ वैसे ही बनाओ। मैं तो ईसो ही हूँ—टेडो-मेड़ो, नटखट-सो!” और जैसे ही चित्रा उनके चेहरे को देखने लगे— उनकी आँखों की शरारत, उस मासूम मुस्कुराहट ने चित्रा का चित्त पूरी तरह जीत लिया। वो तो मानो कृष्ण के प्रेम में खो ही गई थी। मईया कान्हा को लेकर घर लौट आई और बोली— “चित्रा, कल चित्र बना के घर पहुँचा देना।” पर चित्रा? जब-जब चित्र बनाने बैठती— रो पड़ती। चित्र धुँधला हो जाता, आँसू गिरते, रेखाएँ बिगड़ जातीं। क्योंकि कृष्ण की सूरत बनाते बनाते उसका मन कृष्ण में बह जाता। आख़िरकार किसी तरह उसने चित्र पूरा किया और यशोदा के घर पहुँची। मईया ने चित्र देखा और आनंद से झूम उठी— “अरी! मोरो लल्ला तो जस का तस है!” मईया ने वचन दिया— “चित्रा, तू जो माँगैगी, मैं दूँगी।” चित्रा बोली— “सच मइया?” मईया— “हाँ, बिलकुल।” तब चित्रा ने धीरे से कहा— “तो फिर… जिसका चित्र बनायो है… वही दे दो।” ये सुनकर यशोदा मैया का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। आँखों में आँसू भर आए— “लल्ला?… अरी चित्रा, मेरे प्राण मांग ले… पर कान्हा नहीं…” चित्रा ने कहा— “मइया, वचन तोड़ रही हो? तुमने खुद कहा था।” यशोदा ने घर भर में देखा— कहाँ से लाए ऐसी कोई वस्तु जो कृष्ण के समान हो? कान्हा तो अद्वितीय थे, अनुपम थे, अनंत थे! कुछ भी उनके जैसा ना मिला। उसी समय नटखट कान्हा धीरे से चित्रा को एक कोने में ले गए और बोले— “देख चित्रा, तू मुझे ले जायेगी तो मेरी मइया मर जायेगी…” चित्रा की आँखें भर आईं— “पर यदि तू मुझे ना मिलो, तो मैं मर जाऊँगी…” कान्हा ने उसकी आँखों में देखा और अपनी अनुपम मधुर वाणी में कहा— **“अरी चित्रा, मैं तो बृज में इसी लिए आया हूँ… जो भी मुझे सच्चे दिल से याद करेगा, मैं खुद दौड़कर उसके पास आऊँगा। मैं सब गोपियों का लाला हूँ… अनेकों की मइया हैं मेरी। तू भी मेरी मइया है। और मैं अपनी मइया को रोते नाय देख सकता।”** ये सुनते ही चित्रा का हृदय पिघल गया… वो प्रेम में रीझ गई। कह उठी— “ठीक है लल्ला, जब बुलाऊँगी तब आयेगो?” कान्हा मुस्कुराए— “तेरी सो आऊँगा…” चित्रा हँस दी, आँसू पोंछे और यशोदा से बोली— “मइया, मैं तो मजाक कर रही थी। मुझे तेरा लल्ला नहीं चाहिए…” मईया की जान में जान आई। चित्रा ने चित्र लौटा दिया, पर अपने मन में कृष्ण को सदा के लिए बसाकर चली गई। यह कथा हमें बताती है— कृष्ण के प्रति गोपी का प्रेम,माता यशोदा का वात्सल्य प्रेम, और चित्रा का भक्तिभाव… ये तीनों मिलकर वह दिव्य चित्र बनाते हैं, जो केवल हृदय से देखा जाता है—किसी कागज़ या रंग से नहीं। भक्ति से बढ़कर इस संसार में कोई सुख नहीं। जिसने इसे एक बार छू लिया— वह जीवनभर इसके लिए प्यासा रह जाता है। 🚩 जय श्री कृष्णा 🚩

Post media

Comments (0)

No comments yet. Be the first to comment!