
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
1 day ago
पद्म पुराण में वर्णित भगवान कपिल मुनि का प्रादुर्भाव और उनकी माता देवहूति को दिया गया ज्ञान सनातन परंपरा का एक अत्यंत दिव्य और ज्ञानवर्धक प्रसंग है। पद्म पुराण (तथा श्रीमद्भागवत पुराण) के अनुसार, साक्षात भगवान विष्णु ही ज्ञान, सांख्य दर्शन और वैराग्य का प्रसार करने के लिए महर्षि कर्दम और देवहूति के पुत्र के रूप में अवतरित हुए थे। १. पृष्ठभूमि और प्रादुर्भाव की कथा महर्षि कर्दम की तपस्या: स्वयंभुव मनु और महारानी शतरूपा की पुत्री देवहूति का विवाह महर्षि कर्दम से हुआ था। महर्षि कर्दम ने भगवान विष्णु की घोर तपस्या की थी। भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वे स्वयं उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। कन्याओं का जन्म: विवाह के पश्चात देवहूति और कर्दम जी के घर नौ कन्याओं (जैसे अनसूया, अरुंधति आदि) का जन्म हुआ, जिनका विवाह आगे चलकर महान ऋषियों से हुआ। भगवान कपिल का अवतार: इसके बाद स्वयं भगवान श्री हरि (विष्णु) ने देवहूति के गर्भ से अवतार लिया। जब उनका जन्म हुआ, तब देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की और उन्हें 'कपिल' नाम दिया गया। कर्दम जी का संन्यास: भगवान कपिल के जन्म लेते ही महर्षि कर्दम समझ गए कि अब भगवान की लीला प्रारंभ हो चुकी है। उन्होंने भगवान कपिल की स्तुति की और उनसे आज्ञा लेकर संन्यास मार्ग पर गृह त्याग कर जंगल चले गए। २. माता देवहूति की जिज्ञासा और व्याकुलता पति के चले जाने के पश्चात, माता देवहूति को संसार की असारता और विषय-भोगों के प्रति गहरा वैराग्य उत्पन्न हुआ। वे समझ गईं कि यह संसार केवल जन्म-मरण और दुःखों का जाल है। एक दिन माता देवहूति ने अत्यंत विनम्रता और श्रद्धा भाव से अपने पुत्र (साक्षात ईश्वर) भगवान कपिल से प्रार्थना की: "हे प्रभु! मैं इस अज्ञानमयी अंधकार और इंद्रियों की तृष्णा से बहुत थक चुकी हूँ। आप अज्ञान के अंधकार को मिटाने वाले सूर्य के समान प्रकट हुए हैं। कृपा करके मुझे वह ज्ञान प्रदान कीजिए, जिससे मैं इस जन्म-मरण के बंधन (संसार सागर) से सदा के लिए मुक्त हो जाऊँ।" ३. भगवान कपिल का दिव्य उपदेश (सांख्य और भक्ति ज्ञान) माता की निष्कपट प्रार्थना सुनकर भगवान कपिल मुनि मुस्कुराए और उन्होंने अपनी माता को 'सांख्य शास्त्र' तथा 'भक्ति योग' का अत्यंत सहज व गूढ़ उपदेश देना प्रारंभ किया: (क) भक्ति योग का स्वरूप भगवान कपिल ने बताया कि केवल शुष्क ज्ञान से मुक्ति कठिन है, इसलिए भक्ति ही सबसे सरल मार्ग है। सच्ची भक्ति: जब मन बिना किसी स्वार्थ या सांसारिक कामना के केवल ईश्वर के चरणों में लीन हो जाता है, वही निष्काम (अहैतुकी) भक्ति है। इंद्रियों का निग्रह: जैसे गंगा का जल स्वतः समुद्र की ओर बहता है, वैसे ही जब मनुष्य की वृत्तियाँ ईश्वर की ओर मुड़ जाती हैं, तो उसे साक्षात शांति मिलती है। (ख) सांख्य दर्शन (प्रकृति और पुरुष का भेद) भगवान ने सृष्टि के तत्त्वों का ज्ञान देते हुए बताया कि यह संसार दो मुख्य तत्त्वों से बना है— पुरुष (आत्मा/ईश्वर): आत्मा शुद्ध, चैतन्य, अकर्ता और नित्य है। प्रकृति (पदार्थ/माया): प्रकृति तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से युक्त है और इसी से शरीर, मन, बुद्धि व अहंकार बनते हैं। अज्ञान का कारण: जब आत्मा स्वयं को 'शरीर' मान लेती है, तब वह सुख-दुःख, रोग, भय और जन्म-मरण के चक्र में फँसती है। जब जीव यह जान लेता है कि "मैं यह नाशवान शरीर नहीं, बल्कि अजर-अमर आत्मा हूँ", तब वह मुक्त हो जाता है। (ग) कर्म और पुनर्जन्म कपिल मुनि ने बताया कि मनुष्य अपने कर्मों और वासनाओं के अनुसार ही अगला जन्म प्राप्त करता है। जो केवल भोगों में लिप्त रहते हैं, वे बार-बार जन्म-मरण के चक्र में कष्ट भोगते हैं। परंतु जो संपूर्ण कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर देते हैं, वे मुक्त हो जाते हैं। (घ) सत्संग की महिमा भगवान कपिल ने भक्ति प्राप्त करने का सबसे सुलभ साधन 'सत्संग' बताया: संत-महापुरुषों का संग करने से विषय-वासनाएँ नष्ट होती हैं। संतों के संग से ईश्वर की कथाओं में रुचि उत्पन्न होती है, जिससे भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का स्वतः प्रादुर्भाव होता है। ४. कथा का अलौकिक परिणाम (चमत्कार) कपिल देव जी के इस दिव्य और अमृतमयी उपदेश को सुनकर माता देवहूति के मन का सारा अज्ञान, मोह और भय तत्काल नष्ट हो गया।

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