
बद्रीप्रसादअसाटी
296 days ago
🚩🌺🚩🌺🚩🌺🚩🌺🚩🌺 *🚩🌺निर्मल मन जन सो मोहि पावा ।* *🚩🌺मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।* 🚩🌺🚩🌺🚩🌺🚩🌺🚩🌺 *🚩🌺निर्मल मन जन सो मोहि पावा: सनातन धर्म में शुद्ध हृदय का महत्व* *🚩🌺जो पवित्र और निर्मल मन वाला होता है, वही मुझे (भगवान को) प्राप्त करता है। कपट, छल और छिद्र या बुराइयाँ मुझे प्रिय नहीं हैं।* *🚩🌺गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस की यह चौपाई (किष्किंधा कांड, 4/3), स्वयं भगवान श्री राम के मुख से निकली हुई है, जो सनातन धर्म के एक मूलभूत सिद्धांत को प्रकट करती है: ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग हृदय की सरलता, शुद्धता और निष्कपटता से होकर गुजरता है।* *🚩🌺यह केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि सम्पूर्ण धर्मग्रंथों का सार है, जो मनुष्य को उसके आंतरिक जीवन के महत्व की ओर इंगित करता है।* *🚩🌺1. निर्मल मन: ईश्वर प्राप्ति की कुंजी* *🚩🌺सनातन धर्म में मन को ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण माना गया है। वशिष्ठ योग में कहा गया है* *🚩🌺"मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।"* *मन ही मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण है।* *🚩🌺जब मन निर्मल होता है, तो वह सांसारिक आसक्तियों (मोह) और विकारों (राग, द्वेष) से मुक्त हो जाता है। यह निर्मलता ही उस पात्रता को जन्म देती है, जिससे साधक ब्रह्म या ईश्वर का अनुभव कर पाता है। निर्मल मन एक ऐसा दर्पण है, जिसमें परम सत्ता का प्रतिबिंब स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यदि मन रूपी दर्पण मैला हो, तो ईश्वर की निकटता या उनकी उपस्थिति का ज्ञान नहीं हो सकता।* *🚩🌺रामचरितमानस में एक अन्य स्थान पर भगवान शिव कहते हैं कि राम कथा एक निर्मल मानसरोवर है, जिसमें भक्तिपूर्वक गोता लगाने वाला संसार रूपी सूर्य की प्रचण्ड किरणों से नहीं जलता। यह दर्शाता है कि निर्मल मन ही भक्ति और शांति का आधार है।* *🚩🌺2. कपट, छल और छिद्र: आध्यात्मिक अवरोध* *🚩🌺चौपाई का दूसरा भाग, "मोहि कपट छल छिद्र न भावा", नकारात्मक प्रवृत्तियों से दूर रहने का स्पष्ट निर्देश देता है।* *🚩🌺कपट : बाहरी रूप से धार्मिकता का दिखावा करना और भीतर से स्वार्थ या द्वेष रखना। भगवान को ऐसा भक्तिभाव अप्रिय है, जिसमें क्रियाएँ तो हो, पर भाव शुद्ध न हो।* *🚩🌺छल : धोखेबाजी, बेईमानी या मायावी व्यवहार। परमात्मा सत्य के स्वरूप हैं, और इसलिए कपटपूर्ण व्यवहार उनके लिए असहनीय है। छल-कपट मनुष्य को उसके कर्मों के जाल में फँसाता है।* *🚩🌺इसका अर्थ है दोष या दुर्गुण। यह अपनी या दूसरों की कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन विशेष रूप से यह मन के वे दोष हैं जो ईर्ष्या, अहंकार और वासना के रूप में प्रकट होते हैं। एक साधक को इन छिद्रों को भरने का प्रयास करना चाहिए।* *🚩🌺3. भगवद्गीता और निष्कपट कर्म* *🚩🌺सनातन धर्म का एक और प्रमुख ग्रंथ, श्रीमद्भगवद्गीता, भी निर्मल मन की इसी अवधारणा को 'निष्कपट कर्म' और 'समत्व' के माध्यम से पुष्ट करता है। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वह व्यक्ति मुझे अत्यंत प्रिय है, जो: "निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।" जो ममता रहित, अहंकार रहित, सुख-दुःख में सम और क्षमाशील है।* *🚩🌺यह श्लोक उस आंतरिक शुद्धता को दर्शाता है, जो छल और कपट के अभाव में स्वतः उत्पन्न होती है। जब कर्तापन का अहंकार (छल का एक रूप) छूट जाता है, तब कर्म निष्काम हो जाता है, जिससे मन की शुद्धि होती है। गीता का 'निष्काम कर्म योग' सिखाता है कि कार्य फल की आसक्ति के बिना, केवल कर्तव्य के रूप में किया जाना चाहिए, जो कि मन की निष्कपटता का सर्वोच्च रूप है।* *🚩🌺सनातन धर्मग्रंथों का यह सार्वभौमिक संदेश है कि भगवान को बाहरी आडंबर या जटिल कर्मकांडों से नहीं पाया जा सकता, बल्कि सरल, शुद्ध और निष्कपट हृदय से पाया जाता है। निर्मल मन ही वह आधारशिला है, जिस पर भक्ति, ज्ञान और मोक्ष की इमारत खड़ी होती है।* *🚩🌺तुलसीदास जी की यह चौपाई प्रत्येक सनातनी को यह स्मरण कराती है कि जीवन की सबसे बड़ी साधना बाहर नहीं, बल्कि अपने मन को शुद्ध करने में निहित है।* 🚩🌺🚩🌺🚩🌺🚩🌺🚩🌺

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