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जब अर्जुन को हुआ अपने पराक्रम पर अभिमान... 🏹 जानिये क्यों भस्म हो गया अर्जुन का अजेय रथ! 🔥 पोस्ट: 🕉️ महाभारत का एक अद्भुत प्रसंग 🕉️ महाभारत युद्ध अपने चरम पर था। अर्जुन के सारथी स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण थे और रथ की ध्वजा पर साक्षात हनुमान जी विराजमान थे। युद्ध में एक अजीब घटना घट रही थी। जब अर्जुन का बाण छूटता, तो कर्ण का रथ कोसों दूर चला जाता। लेकिन जब कर्ण का बाण छूटता, तो अर्जुन का रथ केवल सात कदम पीछे जाता। आश्चर्य तब हुआ जब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के बजाय कर्ण की प्रशंसा करने लगे: "अद्भुत! कितना वीर है यह कर्ण, जो इस रथ को सात कदम पीछे धकेल देता है।" अर्जुन से रहा नहीं गया। अहंकारवश पूछ बैठे: "हे वासुदेव! यह पक्षपात क्यों? मेरे बाणों से उसका रथ कोसों दूर जा रहा है, उस पराक्रम की आप प्रशंसा नहीं करते, और मात्र सात कदम पीछे धकेलने वाले कर्ण की इतनी वाहवाही?" श्रीकृष्ण का उत्तर सुनकर अर्जुन दंग रह गए: श्रीकृष्ण बोले: "पार्थ! तुम जानते नहीं। तुम्हारे इस रथ पर महावीर हनुमान और मैं स्वयं (त्रिलोकीनाथ वासुदेव) विराजमान हूँ। जिनके भार से पृथ्वी भी डोल सकती है, उस रथ को 'सात कदम' भी पीछे हटा देना कर्ण के महाबली होने का ही प्रमाण है। यदि हम न होते, तो तुम्हारे रथ का अस्तित्व भी न होता।" अर्जुन को अपनी सोच पर बहुत ग्लानि हुई। 🔥 युद्ध का अंतिम दिन और अंतिम सत्य 🔥 युद्ध समाप्त हुआ। हर दिन श्रीकृष्ण पहले उतरते थे, फिर सारथी धर्म के नाते अर्जुन को उतारते थे। किन्तु अंतिम दिन उन्होंने कहा: "अर्जुन! आज तुम पहले उतरो और रथ से थोड़ी दूर चले जाओ।" अर्जुन के उतरते ही, भगवान श्रीकृष्ण जैसे ही रथ से नीचे उतरे, वह विशाल रथ घोड़ों सहित धूं-धूं कर जल उठा और क्षण भर में भस्म हो गया। अर्जुन हतप्रभ थे! भगवान बोले: "पार्थ! आश्चर्य कैसा? यह रथ तो भीष्म, कृपाचार्य और कर्ण के दिव्यास्त्रों से कभी का नष्ट हो चुका था। यह तो मात्र मेरे संकल्प से युद्ध समापन तक जीवित था। आज मैंने अपनी शक्ति हटा ली, तो यह अपने वास्तविक रूप में आ गया।" ✅ सार: यह कथा हम सबके लिए एक बड़ा उपदेश है। हम अपनी सफलताओं पर व्यर्थ ही अभिमान करते हैं। सत्य तो यह है कि सब कुछ ईश्वर का किया हुआ है, "हम तो केवल निमित्त मात्र हैं।" 🙏 जय श्री कृष्ण 🙏

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