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धर्म और अधर्म 🍁🍁🍁🍁🍁 महाराज तुलसीदास जी की दो चौपाई धर्म और अधर्म को अपने बहुत सुंदर और संक्षिप्त वर्णन कर सभी को अद्भुत संदेश देते है । कठिन एक लाख श्लोक से भी ज्यादा प्रभाव डाल ते है । एक चौपाई 🍁🌹🍁🌹🍁 दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान । तुलसी दया ना छोडिए जब तक घट मे प्रान । 🌹🍁🌹🍁 अर्थ सब पर दया करना ही धर्म की आत्मा है । मूल सिद्धांत है ।और अपने आप को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए जो भी मार्ग अपनाकर यदि किसी को हानि किसी प्रकार से पहुँचा रहे है । वही अधर्म है कहा गया है। और तुलसीदास जी महाराज यह भी कह रहे है जब तक हमारे शरीर मे सांस शेष है ।यह दया का भाव कभी नही छोडना चाहिए। 🌹🍁🌹🍁 दूसरी चौपाई 🍁🍁🍁🍁🍁 परहित सरिस धर्म नही भा ई पर पीड़ा सम नही अधमा ई अर्थ। दूसरे की सहायता, मदद,सेवा,निस्वार्थ भाव, ही धर्म है ।और श्रेष्ठतम कर्म है । और दूसरे को पीडा पहुँचाना ही अधर्म है ।किसी भी तरह कष्ट देना ही अधर्म के समान है । और यह भी कह दिया की दूसरो कष्ट पहुँचा ने का कर्म सबसे बडा नीच कर्म है । मन,कर्म,वचन,से । 🌹🍁🌹🍁 यह 600 वर्ष पूर्व महान संत तुलसीदास जी लिख रहे जो आज के परिवेश मे समस्त विश्व के लिए लागू होता है। धर्म कोई भी हो वे जीवन जीने के सामाजिक नियम से ज्यादा कुछ नही है । सारे धर्म देश काल परिस्थित के अनुसार बने है । जो मनुष्य समुदाय को आजकल आपस मे लडा रहे है तुलसीदास जी ने धर्म को परहित करना के कर्म को कहा। और दूसरे को कष्ट देने को अधर्म कहा और नीच कर्म कहा । जय श्रीकृष्ण 🌹🍁🌹🍁🌹🍁 डा रवींद्र खरे नागपुर 🙏🌹🙏🌹

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