MyMandirInstall

रामचरित: लंकाकाण्ड ; दोहा ४२. राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुखेन | कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन || अर्थात् तुलसीदासजी कहते हैं कि लक्ष्मणजी , श्रीरामजी से आज्ञा लेकर अंगदादि बानरों के साथ हाथ में धनुष- बाण लेकर मेघनाद से युद्ध के लिए चले | युद्ध में मेघनाद द्वारा छल - बल और अनीति करने पर लक्ष्मणजी क्रोधित हुए और उसके रथ को तोड़ डाला और सारथि के टुकड़े- टुकड़े कर दिए | लक्ष्मणजी के प्रहार से मेघनाद के प्राणमात्र शेष रह गए , तब उसने वीरघातिनी शक्ति चलाई जो लक्ष्मणजी के छाती में लगी , जिससे उन्हें मुर्छा आ गया | तब जाम्बवान के बताने पर हनुमानजी घर समेत सुखेण को उठा लाये | सुखेण ने आकर श्रीरामजी के चरणारविन्दों में सिर नवाया तथा पर्वत और औषधि का नाम बता कर कहा कि हे पवनपुत्र ! औषधि लेने जाओ | तात्पर्य यह है कि सुखेणजी की तरह प्रभु की कृपा हमारे ऊपर भी हो कि श्रीरामजी के चरणकमलों में हम भी बारंबार सेवा हेतु नतमस्तक होकर अपना जीवन धन्य करते रहें | जय जय सीताराम |

Comments (1)

R k jangid 

phulera Jaipur

R k jangid phulera Jaipur

May 11, 2026

जय सियाराम जी🌹🙏