
Rama Devi Sahu
272 days ago
*🕉️ रात्रि कहानी 🕉️* राजीव की उम्र जब चालीस के पार पहुंच चुकी थी, तब जाकर उसने अपने ऑफिस में काम करने वाली सहयोगी नेहा से विवाह किया। नेहा एक अनाथ लड़की थी, जिसे उसके चाचा-चाची ने पाला था। राजीव भी कोई बडे़ खानदान से नहीं था — पिता बचपन में ही गुजर गए थे, और अब घर में बस एक ही सहारा था — उसकी बीमार मां कुसुम जी। शादी के बाद नेहा ने ना सिर्फ घर को संवारा, बल्कि सासू मां की सेवा में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। दवा, खाना, सफाई — सब कुछ वो समय पर और पूरी श्रद्धा से करती। कुसुम जी भी बहू से बहुत प्रसन्न थीं। पर धीरे-धीरे एक बदलाव उन्होंने महसूस किया — नेहा अब उनके साथ बैठकर खाना नहीं खाती थी। पहले दोनों साथ बैठकर बातें करते, खाना खाते और हँसते। लेकिन अब नेहा, किचन का सारा काम खुद करती और खाना कहीं एक कोने में जाकर खा लेती। एक दिन शाम को नेहा ने जैसे ही कुसुम जी को चाय और बिस्किट थमाए, खुद थोड़ी दूर बैठ गई और एक लाल डिब्बे से कुछ खाने लगी। कुसुम जी की नज़र उसी डिब्बे पर अटक गई — "आख़िर उसमें ऐसा क्या है जो मुझे नहीं दे रही?" रात को जब सब सो गए, तो दिल की बेचैनी उन्हें रसोई तक खींच लाई। उन्होंने कांपते हाथों से डिब्बा उठाया... लेकिन हाथ फिसल गया और डिब्बा ज़मीन पर जा गिरा। धड़ाम! राजीव और नेहा दौड़े आए, "क्या हुआ माँजी?" "कुछ नहीं बेटा, शक्कर ढूंढ रही थी..." उन्होंने बात को टालने की कोशिश की। नेहा ने झुककर डिब्बा समेटते हुए कहा, "कल से मिश्री आपके कमरे में ही रख दूंगी माँजी।" कुसुम जी की नज़र उस खुले डिब्बे पर पड़ी — अंदर सिर्फ टूटे हुए बिस्किट के टुकड़े थे। सुबह होते ही उन्होंने धीमे स्वर में कहा — "बहू... मेरे दांत अब साबुत बिस्किट नहीं तोड़ पाते... वही टुकड़े ही दे दिया करो ना।" नेहा ने मुस्कुराकर जवाब दिया "माँजी, आप ही तो कहती थीं — बचा-कुचा किसी को नहीं देना चाहिए... फिर आपको मैं कैसे दे दूं?" कुसुम जी की आँखें भर आईं। उन्होंने नेहा का हाथ थामा और कांपते स्वर में बोलीं — "बेटी, तू मेरी सबसे बड़ी दौलत है... तूने मुझे रिश्तों की असली मिठास चखाई है।" ये कहानी सिर्फ नेहा और कुसुम जी की नहीं, हर उस घर की है जहाँ दिल से बनाए गए रिश्ते, शब्दों से कहीं ज़्यादा बोलते हैं। रिश्ते बिस्किट की तरह नहीं होते... जो टूट जाएं तो फेंक दिए जाएं, बल्कि टूटे हिस्से में भी मिठास हो सकती है — अगर नज़र में समझदारी हो। *हकीकत** *तन्हा बैठा था एक दिन मैं अपने मकान में,* *चिड़िया बना रही थी घोंसला घर के रोशनदान में।* *पल भर में आती पल भर में जाती थी वो,* *छोटे छोटे तिनके चोंच में भर लाती थी वो।* *बना रही थी वो अपना घर एक न्यारा,* *मात्र तिनका ही था उसके लिए ईंट और गारा।* *कुछ दिन बाद....* *मौसम बदला, हवा के झोंके आने लगे,* *नन्हे से दो बच्चे घोंसले में चहचहाने लगे।* *पाल रही थी चिड़िया उन्हे,* *पंख निकल रहे थे दोनों के,* *पैरों पर करती थी खड़ा उन्हे।* *देखता था मैं हर रोज ये नजारा* *जज्बात मेरे उनसे कुछ जुड़ गए ,* *पंख निकलने पर दोनों बच्चे,मां को छोड़ अकेला उड़ गए।* *चिड़िया से पूछा मैंने..* *तेरे बच्चे तुझे अकेला क्यों छोड़ गए,* *तू तो थी मां उनकी,* *फिर ये रिश्ता क्यों तोड़ गए?* *चिड़िया बोली...* *परिन्दे और इंसान के बच्चे में यही तो फर्क है,* *इंसान का बच्चा.....* *पैदा होते ही अपना हक जमाता है,* *न मिलने पर वो मां बाप को,कोर्ट कचहरी तक भी ले जाता है।* *मैंने बच्चों को जन्म दिया,पर करता कोई मुझे याद नहीं,* *मेरे बच्चे क्यों रहेंगे साथ मेरे क्योंकि मेरी कोई जायदाद नहीं।* **सादर *जय श्री कृष्ण* *🙏शुभ रात्रि 🙏*

Comments (4)

Sanju ❤️
Dec 1, 2025
bahut khoob 👌 radhe radhe 👏❤️❤️❤️

Suresh Kumar
Dec 1, 2025
राधे राधे जी 🌹🙏🌹शुभ रात्री वंदन

Rama Devi Sahu
Dec 1, 2025
Dhanyawad 🙏 Radhe Radhe 🙏 Jai Shree Krishna 🙏 Subha Ratri Jii 🙏🌹🌹

H.S.CHAHAR
Dec 1, 2025
🙏🌹शुभ रात्रि जय श्री कृष्णा जय श्री राधे राधे बहुत सुंदर कहानी ऐसे ही पोस्ट डालते रहो बहुत सुंदर लगता है जय श्री कृष्णा जय श्री राधे राधे भगवान आपका दिन मंगलमय करें और रात में सपने सच्चे करें 🌹🙏
