
Rama Devi Sahu
180 days ago
फाल्गुन पूर्णिमा - श्री चैतन्य महाप्रभु जयंती बंगाल के नदिया जिले के नवद्वीप गांव में संवत् 1543 को फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को सिंहलग्न में श्री जगन्नाथ मिश्र के यहां माता शची देवी की गोद में गौर सुंदर शिशु प्रकट हुआ , जो ' गौरांग ' कहलाया। इनका जन्म नीम पेड़ के तले हुआ था, इसलिए लोग इन्हें " निमाई " भी कहते हैं। श्री जगन्नाथ मिश्रा के ज्येष्ठ पुत्र युवा होते ही संन्यासी हो गए थे। पुत्र-वियोग में मिश्रा जी का असमय ही निधन हो गया। माता सती के लिए निमाई ही आधार रह गए थे। निमाई जब पिता का श्राद्ध करने गया पहुंचे , तो उनका संपर्क एक संन्यासी - ईश्वरपुरी से हुआ , जिन्होंने निमाई को श्रीकृष्ण-भक्ति के रंग से सराबोर कर दिया। गया से लौटने पर गौरांग के प्रभाव के कारण नवद्वीप प्रेमोन्मत्त भक्तों का वृंदावन बन गया। अनेक प्रकांड विद्वान गौरांग की भक्ति रसधारा में निमग्न हो गए। अतः वे " महाप्रभु " कहलाने लगे। माता शची के आग्रह पर महाप्रभु का पुनर्विवाह विष्णुप्रिया से हुआ। (उनकी पहली पत्नी का देहान्त सर्पदंश से हो गया था।) सांसारिक-जीवन व्यतीत करने के लिए तथा वंश-रक्षा के लिए माता शची ने गौरांग का पुनर्विवाह करवाया था। लेकिन गौरांग पर माया का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। जो मायापति भगवान श्रीकृष्ण की शरण में हो , उस पर भला माया का प्रभाव कैसे पड़ सकता है ! गौरांग ने 24 वर्ष की अवस्था में श्री केशव भारती जी से संन्यास की दीक्षा ग्रहण की। संन्यास लेने के पश्चात् उनका नाम " श्रीकृष्ण चैतन्य " हुआ। वे " चैतन्य महाप्रभु " के नाम से विख्यात हो गए। महाप्रभु का नवद्वीप छूट गया और महाप्रभु ने श्री जगन्नाथ धाम को अपना निवास बनाया। यहां से काशी होते हुए उन्होंने एक बार वृंदावन की यात्रा की। काशी के वेदांत के प्रकांड पंडित प्रकाशानंद सरस्वती महाप्रभु के अनुगामी हो गए। एक बार उन्होंने नीलांचल (दक्षिण भारत) एवं मध्य भारत की यात्रा भी की थी। श्री महाप्रभु अंत तक जगन्नाथधाम में ही विराजे और जब इहलोक छोड़ना हुआ , तो वे श्री जगन्नाथ जी के श्रीविग्रह में लीन हो गए। महाप्रभु का प्रेममय जीवन हिंदी में " चैतन्य चरितावली " में तथा बंगला में " अमिय निमाई चरित" में अवलोकन करना चाहिए। चैतन्य महाप्रभु के दर्शन को आचार्य बलदेव विद्याभूषण ने " अचिंत्यभेदाभेदवाद " की संज्ञा दी। श्री महाप्रभु ने जाति-पातिका विरोध किया तथा ढोलक-मजीरे के साथ हरिनाम ( हरे राम ! हरे कृष्ण !) संकीर्तन को घर-घर पहुंचाया। श्री महाप्रभु ने भक्ति और श्रीकृष्ण-कीर्तन की धारा संपूर्ण भारत में प्रवाहित की , जो धारा आज भी मनुष्यों को पावन करती हुई अविच्छिन्न प्रवाहित हो रही है। चैतन्य महाप्रभु द्वारा रचित " शिक्षाष्टक " ही मात्र उपलब्ध है। महाप्रभु ज्ञानी भक्त थे। उन्होंने ज्ञानी भक्त की प्रार्थना के निर्मलत्व को शिक्षाष्टक के चौथे श्लोक में सुंदर शब्दों में व्यक्त किया है - न धनं न जनं न सुंदरीं कवितां वा जगदीश कामये। मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि।। अर्थ - हे जगत के ईश्वर! मुझे धन , अनुयायी , सुंदरी (स्त्री) या कविता (यश) की इच्छा कभी न हो। हे प्रभु ! मुझे हर जन्म में केवल आप के चरणों में अकारण भक्ति हो। श्री हरि का भजन करनेवाले को कैसा होना चाहिए ? इस पर " शिक्षाष्टक " के तीसरे श्लोक में लिखते हैं - तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीय: सदा हरि:।। अर्थ - स्वयं को तृण (घास) से भी छोटा समझते हुए , पेड़ के समान सहिष्णु रहते हुए , कोई अभिमान न रखते हुए और दूसरों का सम्मान करते हुए - सदा श्रीहरि का भजन करना चाहिए। एक तरह से उन्होंने संकीर्तन करनेवाले भक्त के लक्षण को अभिव्यक्त किया है। इस आधार पर क्या हम भक्त होने के अधिकारी हैं ? - इस पर आप स्वयं विचार करें। मिथिलेश ओझा की ओर से " चैतन्य महाप्रभु जयंती " पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।

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