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🌹रामचरित :उत्तरकाण्ड; दोहा🌹 🌹२०. बार बार बर मागउॅं हरषि देहु श्रीरंग 🌹| 🌹पद सरोज अनपायनी भगति सदा सत्संग ||🌹 🌹अर्थात् तुलसीदासजी कहते हैं कि शिवजी 🌹, श्रीरामजी से स्तुति करते हुए बोले कि हे लक्ष्मीपते !🌹 मैं आपसे बार बार यही वरदान माॅंगता हूँ कि मुझे आपके चरणकमलों की अचल भक्ति और आपके भक्तों का सत्संग सदा प्राप्त हो 🌹, जिसे आप हर्षित होकर दीजिये |🌹 इस प्रकार श्रीरामजी के गुणों का वर्णन करके उमापति महादेवजी हर्षित होकर कैलाश को चले गए |🌹 🌹 तात्पर्य यह है कि महादेवजी की तरह हमें भी लक्ष्मीपति भगवान से उनकी अविचल भक्ति और उनके भक्तों के सत्संग की ही याचना करनी चाहिए |🌹 जय जय सीताराम |🌹🌹 🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏

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