
Rama Devi Sahu
2 days ago
*🌞~ वैदिक हिन्दू पंचांग ~🌞* *⛅दिनांक - 18 सितम्बर 2026* *⛅दिन - शुक्रवार* *⛅विक्रम संवत् - 2083* *⛅अयन - दक्षिणायण* *⛅ऋतु - शरद* *⛅मास - भाद्रपद* *⛅पक्ष - शुक्ल* *⛅तिथि - सप्तमी दोपहर 01:00 तक तत्पश्चात् अष्टमी* *⛅नक्षत्र - ज्येष्ठा रात्रि 10:44 तक तत्पश्चात् मूल* *⛅योग - प्रीति दोपहर 01:35 तक तत्पश्चात् आयुष्मान्* *⛅राहुकाल - सुबह 10:49 से दोपहर 12:21 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)* *⛅सूर्योदय - 06:14* *⛅सूर्यास्त - 06:28 (सूर्योदय एवं सूर्यास्त उज्जैन मानक समयानुसार)* *⛅दिशा शूल - पश्चिम दिशा में* *⛅ब्रह्ममुहूर्त - प्रातः 04:40 से प्रातः 05:27 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)* *⛅अभिजीत मुहूर्त - दोपहर 11:56 से दोपहर 12:45 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)* *⛅निशिता मुहूर्त - रात्रि 11:57 से मध्यरात्रि 12:45 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)* *🌥️व्रत पर्व विवरण - ललिता सप्तमी, ज्येष्ठ गौरी पूजा, दूर्वा अष्टमी* *🌥️विशेष - सप्तमी को ताड़ का फल खाने से रोग बढ़ता है तथा शरीर का नाश होता है एवं अष्टमी को नारियल का फल खाने से बुद्धि का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)* *✨ निर्वाणवर्णन सर्ग 280 📜* *🔴 बाल्मीकिजी📜 बोले, हे भरद्वाज! जब ऐसे रामजी🙏 ने कहा तब वशिष्ठजी✨ बोले, हे रामजी! बड़ा कल्याण😇 हुआ कि तुम अपने आप में स्थित हुए हो | अब तुमने यथार्थ जाना है पर अब जो कुछ सुनने की इच्छा💭 हो सो कहो |* *🔴 रामजी बोले, हे संशयरूपी अन्धकार🌑 के नाशकर्ता सूर्य☀️ और संशयरूपी वृक्षों🌳 के नाशकर्ता कुठार🪓! अब तुम्हारे प्रसाद से मैं परम विश्रान्ति😌 को प्राप्त हुआ हूँ और जाग्रत्🌅, स्वप्न💤, सुषुप्ति की कलना से रहित हूँ | जाग्रत् जगत🌍 भी मुझको सुषुप्तिवत् भासता है और श्रवण करने की इच्छा नहीं रही | अब परमध्यान🧘♂️ मुझको प्राप्त हुआ है अर्थात् आत्मा🌟 से भिन्न कुछ वस्तु नहीं भासती |* *🔴 मैं आत्मा, अज, अविनाशी♾️, शान्तरूप🕊️ और अनन्त🌌, सदा अपने आप में स्थित हूँ | ऐसे मुझको मेरा नमस्कार🙏 है | अब प्रलयकाल का पवन🌬️ चले और समुद्र🌊 उछलें और नाना क्षोभ हों तो भी मेरा चित्त🧠 स्वरूप से चलायमान न होगा और जो त्रिलोकी का राज्य👑 मुझको प्राप्त हो तो भी मेरे चित्त में हर्ष न उपजेगा मैं सत्ता समान में स्थित हूँ |* *🔴 बाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज! जब इस प्रकार रामजी ने कहा तब मध्याह्न का सूर्य🌞 शिर पर उदय हुआ और राजा जो रत्न💎 और मणियों के भूषण पहिनकर बैठे थे उन मणियों की कान्ति✨ किरणों से अति विशेष हुई और सूर्य के साथ हो एक हो गई-मानों ऐसे वचन सुनकर नृत्य💃 करती है |* *🔴 तब वशिष्ठजी ने कहा, हे रामजी! अब हम जाते हैं क्योंकि मध्याह्न की उपासना📿 का समय है, जो कुछ तुम्हें पूछना हो सो कल फिर पूछना | तब राजा दशरथ पुत्रोंसहित उठ खड़े हुए और वशिष्ठजी का बहुत पूजन🌸 किया | जो ऋषीश्वर मुनीश्वर और ब्राह्मण थे उनका भी यथायोग्य पूजन किया और मोती और हीरों की माला, मोहरें, रुपये, घोड़े🐎, गऊ🐄, वस्त्र भूषण आदि जो ऐश्वर्य👑 की सामग्री है उससे यथायोग्य पूजन किया | जो विरक्त सन्यासी थे उनको प्रणाम🙏 करके प्रसन्न किया और जो राजर्षि थे उनका भी पूजन किया |* *🔴 तब वशिष्ठजी उठ खड़े हुए और परस्पर सबने नमस्कार किया और मध्याह्न के नौबत नगाड़े🥁 बजने लगे | तब श्रोता👂 उठकर विचरने लगे | कोई चले जाते थे और कोई शीश हिलाते, कोई हाथ की अँगुली हिलाते, नेत्रों👁️ की भवें हिलाते परस्पर चर्चा करते जाते थे | इस प्रकार सब अपने स्थानों🏠 को गये |* *🔴 वशिष्ठजी सन्ध्या उपासना करने लगे और सर्व श्रोता विचारपूर्वक रात्रि🌙 को व्यतीतकर सूर्य की किरणों के निकलते ही आ पहुँचे | गगनचारी सप्तलोक के रहनेवाले, ऋषि और देवता👼, भूमिवासी राजर्षि और जो श्रोता थे सो सब आकर अपने अपने स्थान पर बैठ गये और सबने परस्पर नमस्कार किया तब रामजी हाथ जोड़कर उठ खड़े हुए और बोले, हे भगवन्! अब जो कुछ मुझको सुनाना और जानना रहा है सो तुम ही कृपा😇 करके कहो |* *🔴 वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो कुछ सुनने योग्य था सो तुमने सुना है | अब तुम कृतकृत्य🎯 हुए हो और सर्व रघुवंशियों का कुल तुमने तारा है और जो आगे होंगे सो सब तुमने कृतकृत्य किये हैं | अब तुम परमपद🕉️ को प्राप्त हुए हो और जो कुछ तुमको पूछने की इच्छा है सो पूछ लो |* *🔴 हे रामजी! जो सत्तासमान में स्थित हुए हो तो विश्वामित्र के साथ जाकर इनका कार्य⚙️ करो और जो कुछ पूछने की इच्छा हो सो पूछ लो |* *🔴 रामजी ने पूछा, हे भगवन्! आगे मैं अपने आपको इस देह संयुक्त परिच्छिन्नरूप देखता था और अब अपने आपसे भिन्न मुझको कुछ नहीं भासता सब अपना आप ही भासता है | हे मुनीश्वर! अब इस शरीर💪 से मुझको कुछ प्रयोजन नहीं रहा | जैसे फूल🌸 से सुगन्ध🌬️ लेकर पवन च
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
