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Rama Devi Sahu

14 days ago

प्राचीन काल की बात है। समुद्र के किनारे बसी वह पावन भूमि, जिसे आज हम पुरी के नाम से जानते हैं, बाहर से देखने पर एक सामान्य तीर्थ जैसी दिखाई देती थी, लेकिन उसके भीतर ऐसा आध्यात्मिक रहस्य छिपा था जिसे जानकर स्वयं देवता भी नतमस्तक हो जाते थे। कहते हैं कि यह भूमि किसी साधारण आकृति में नहीं, बल्कि साक्षात शंख के आकार में स्थित है। यही कारण है कि भगवान श्रीहरि के इस पवित्र क्षेत्र को शंख क्षेत्र कहा गया। मान्यता है कि जैसे भगवान विष्णु के हाथ में पांचजन्य शंख उनकी दिव्य शक्ति का प्रतीक है, वैसे ही पृथ्वी पर पुरी की यह भूमि भगवान के शंख का ही दिव्य स्वरूप मानी गई। इस रहस्यमयी क्षेत्र की सीमा में प्रवेश करते ही मानो मनुष्य सामान्य संसार से निकलकर एक ऐसी आध्यात्मिक भूमि में प्रवेश करता है जहां हर दिशा में भगवान की उपस्थिति का अनुभव होता है। कहा जाता है कि एक समय यमराज स्वयं इस क्षेत्र की सीमा तक पहुंचे थे। उनके हाथ में मृत्यु का दंड था और उनके साथ अनगिनत जीवों के कर्मों का लेखा-जोखा था। लेकिन जैसे ही वे इस पवित्र भूमि की सीमा के पास पहुंचे, उनके कदम रुक गए। यमराज ने आश्चर्य से सामने देखा और पूछा, “यह कैसी भूमि है जहां मेरे अधिकार की सीमा समाप्त होती हुई दिखाई दे रही है?” तभी माता लक्ष्मी ने उन्हें इस क्षेत्र का दिव्य रहस्य समझाया। उन्होंने कहा कि यह केवल धरती का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि भगवान पुरुषोत्तम की विशेष लीला भूमि है। यहां आने वाले जीवों पर भगवान की विशेष कृपा मानी जाती है। यमराज ने जब इस भूमि को भीतर से समझने का प्रयास किया तो उनके सामने एक अद्भुत दिव्य नक्शा प्रकट हुआ। उस नक्शे को देखकर वे भी कुछ क्षण के लिए मौन रह गए, क्योंकि पूरी भूमि का आकार किसी साधारण नगर जैसा नहीं, बल्कि एक विशाल शंख जैसा दिखाई दे रहा था। शंख के अग्रभाग की ओर एक और अद्भुत रहस्य छिपा था। वहां महादेव नीलकंठ रूप में इस पवित्र क्षेत्र की रक्षा करते हुए विराजमान माने जाते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव स्वयं इस क्षेत्र के रक्षक हैं और भगवान जगन्नाथ के प्रति उनकी भक्ति अद्भुत है। ऐसा लगता था मानो शंख क्षेत्र में प्रवेश करने वाले प्रत्येक जीव से महादेव कह रहे हों कि यह भूमि केवल भगवान विष्णु की नहीं, बल्कि शिव और विष्णु की एकता का भी प्रतीक है। जो व्यक्ति इस भूमि में प्रवेश करता है, वह केवल एक मंदिर की ओर नहीं बढ़ रहा होता, बल्कि उस आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश कर रहा होता है जहां अनेक दिव्य शक्तियां एक साथ विराजमान मानी जाती हैं। इसके बाद सामने आया कपाल मोचन का रहस्य। पुराणों में वर्णित एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब ब्रह्मा जी का एक सिर महादेव द्वारा अलग किया गया, तब उसका कपाल शिव जी के हाथ से अलग नहीं हुआ। महादेव उस कपाल को लेकर अनेक स्थानों पर भटके, लेकिन वह उनके हाथ से नहीं छूटा। अंततः जिस पवित्र भूमि में वह कपाल गिरा, उसे कपाल मोचन से जोड़ा जाता है। इस घटना ने इस क्षेत्र की महिमा को और भी रहस्यमय बना दिया। मान्यता बनी कि यह ऐसी भूमि है जहां अत्यंत कठिन आध्यात्मिक बंधन भी समाप्त हो सकते हैं और जहां भगवान की कृपा से जीव अपने पुराने कर्मों के बोझ से मुक्ति की ओर बढ़ सकता है। इसी पवित्र क्षेत्र में माता विमला का भी विशेष स्थान माना जाता है। यहां भगवान जगन्नाथ की आराधना के साथ शक्ति की उपासना भी जुड़ी हुई है। यह बात इस क्षेत्र को और विशिष्ट बनाती है, क्योंकि यहां वैष्णव और शाक्त परंपराओं का अद्भुत संगम दिखाई देता है। मान्यता के अनुसार माता विमला इस क्षेत्र की अधिष्ठात्री शक्तियों में से एक हैं। इससे यह संदेश मिलता है कि परम शक्ति को अलग-अलग रूपों में देखने के बावजूद उसके मूल में वही एक दिव्य चेतना विद्यमान है। पुरी की आध्यात्मिक परंपरा इसी समन्वय के कारण सदियों से भक्तों को आकर्षित करती रही है। लेकिन शंख क्षेत्र का रहस्य अभी समाप्त नहीं हुआ था। जैसे-जैसे दिव्य नक्शा अपने मध्य भाग की ओर बढ़ा, वहां एक अत्यंत पवित्र क्षेत्र दिखाई दिया। कहा जाता है कि शंख की नाभि के समान इस मध्य क्षेत्र में रोहिणी कुंड, अक्षयवट और भगवान पुरुषोत्तम से जुड़ी दिव्य मान्यताएं स्थित हैं। इन स्थानों को पुरी की आध्यात्मिक संरचना का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। अक्षयवट को अक्षय अर्थात कभी न समाप्त होने वाली दिव्यता का प्रतीक माना

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