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Rama Devi Sahu

138 days ago

एक बार एक जिज्ञासु भक्त ने भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में बैठकर एक अत्यंत प्राचीन और जटिल प्रश्न पूछा— "हे माधव! मनुष्य के जीवन में बड़ा कौन है आखिर......उसका 'भाग्य' , जो पहले से लिखा जा चुका है, या उसका 'पुरुषार्थ' , जो वह आज कर रहा है? यदि सब कुछ भाग्य में लिखा है, तो कर्म क्यों करें? और यदि कर्म ही सब कुछ है, तो भाग्य की चर्चा क्यों?" भगवान श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्कुराए। उन्होंने पास पड़ी हुई एक लंबी रस्सी उठाई। उन्होंने उस रस्सी का एक सिरा भक्त के दाहिने हाथ में दिया और दूसरा सिरा स्वयं अपने हाथ में पकड़ लिया। श्रीकृष्ण की सीख भगवान ने कहा— "प्रिय भक्त, इस रस्सी के एक सिरे को तुम 'भाग्य' मानो और दूसरे सिरे को 'पुरुषार्थ' (मेहनत)।" * सिर्फ भाग्य का सिरा: श्रीकृष्ण ने रस्सी का अपना वाला सिरा ढीला छोड़ दिया। रस्सी नीचे गिर गई। प्रभु बोले— "यदि तुम केवल भाग्य के भरोसे बैठे रहोगे और पुरुषार्थ का सिरा छोड़ दोगे, तो जीवन की यह रस्सी अर्थहीन होकर जमीन पर गिर जाएगी। बिना कर्म के, भाग्य की शक्ति सुप्त (सोई हुई) रहती है।" * सिर्फ कर्म का सिरा: अब श्रीकृष्ण ने रस्सी को अपनी ओर जोर से खींचा, लेकिन भक्त ने अपना सिरा (पुरुषार्थ) ढीला रखा। रस्सी फिर भी काम नहीं आई। प्रभु बोले— "यदि तुम केवल अहंकार में कर्म करते रहे और ईश्वरीय विधान (भाग्य) को स्वीकार नहीं किया, तो जीवन का संतुलन बिगड़ जाएगा।" परम सत्य अंत में, श्रीकृष्ण ने रस्सी को दोनों तरफ से तानकर पकड़ लिया और बोले— "जीवन की गति तभी संभव है, जब दोनों सिरे मजबूती से थामे जाएं। भाग्य वह 'अवसर' है जो मैं तुम्हें देता हूँ, और पुरुषार्थ वह 'प्रयास' है जो तुम उन अवसरों को भुनाने के लिए करते हो। जैसे नाव चलाने के लिए दो चप्पू चाहिए, वैसे ही जीवन की यात्रा के लिए 'कर्म' और 'कृपा' (भाग्य) दोनों का साथ होना अनिवार्य है।" * हमारा 'कल का पुरुषार्थ' ही 'आज का भाग्य' बनता है। इसलिए वर्तमान में किया गया श्रेष्ठ कर्म ही भविष्य की सुंदर नियति लिखता है। 🙏

Comments (2)

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Apr 15, 2026

*इन्सान की जिंदगी में तीन चीज़ें,बहुत उलझी होती है..* *दिल,दिमाग और तक़दीर* *दिल कुछ चाहता है फिर दिमाग उसे पाने के लिए रास्ता तलाश करता है,* *पर होता वही है जो तक़दीर में लिखा होता है...* *🙏Suprbhat 🙏*

NITIN SONI 🙏🌹

NITIN SONI 🙏🌹

Apr 15, 2026

जय श्री राधे कृष्णा