
Rama Devi Sahu
1 hours ago
*🌞~ वैदिक हिन्दू पंचांग ~🌞* *⛅दिनांक - 26 अगस्त 2026* *⛅दिन - बुधवार* *⛅विक्रम संवत् - 2083* *⛅अयन - दक्षिणायण* *⛅ऋतु - शरद* *⛅मास - श्रावण* *⛅पक्ष - शुक्ल* *⛅तिथि - त्रयोदशी सुबह 07:59 तक तत्पश्चात् चतुर्दशी* *⛅नक्षत्र - श्रवण मध्यरात्रि 12:48 तक तत्पश्चात् धनिष्ठा* *⛅योग - सौभाग्य सुबह 07:59 तक तत्पश्चात् शोभन* *⛅राहुकाल - दोपहर 12:29 से दोपहर 02:04 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)* *⛅सूर्योदय - 06:07* *⛅सूर्यास्त - 06:50 (सूर्योदय एवं सूर्यास्त उज्जैन मानक समयानुसार)* *⛅दिशा शूल - उत्तर दिशा में* *⛅ब्रह्ममुहूर्त - प्रातः 04:37 से प्रातः 05:22 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)* *⛅अभिजीत मुहूर्त - कोई नहीं* *⛅निशिता मुहूर्त - मध्यरात्रि 12:06 से मध्यरात्रि 12:51 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)* *🌥️व्रत पर्व विवरण - ऋग्वेद उपक्रम, ओणम,* *🌥️विशेष - चतुर्दशी को स्त्री-सहवास तथा तिल तेल खाना और लगाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)* 🌹 *विद्यावादबोधोपदेश २ — सर्ग २७२* 🌹 🔴 *हे रामजी! आत्मसत्ता अव्यभिचारी है अर्थात् सत्तामात्र है उसका अभाव कदाचित् नहीं होता और अच्युत है अर्थात् सदा ज्यों का त्यों है अपने भाव को कदाचित् नहीं त्यागता इसलिये जो उससे भिन्न भासे उसे भ्रममात्र जानो।* 🔴 *हे रामजी! विचार करके जब दृश्यभ्रम शान्त होता है तब मोक्ष प्राप्त होता है। आत्मसत्ता ज्ञानरूप और निराकार सदा अपने आपमें स्थित है। जब सम्यक् ज्ञान का बोध होता है तब जगत्भ्रम नष्ट होता है।* 🔴 *रामजी ने पूछा, हे मुनीश्वर! सम्यक् ज्ञान और बोध किसको कहते हैं?* 🔴 *वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! अनुभव ही बोध कहाता है और उसको ज्यों का त्यों जानना सम्यक् ज्ञान है।* 🔴 *रामजी ने पूछा, हे भगवन्! केवल बोध और केवल ज्ञान किसको कहते हैं?* 🔴 *वशिष्ठजी बोले, हे राघव! दृश्य से रहित जो चिन्मात्र है उसको तुम केवल बोध जानो—उसमें वाणी की गम नहीं। इसी प्रकार अचेत चिन्मात्र सत्ता को ज्यों का त्यों जानना ही केवल ज्ञान है।* 🔴 *रामजी ने पूछा, हे भगवन्! केवल बोध अचेत चिन्मात्र है तो उसमें जगत्भ्रम क्यों भासता है?* 🔴 *वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! चिन्मात्र जो दृष्टारूप है उसमें जब संवेदन चेतना फुरती है तब वही चेतना चैतरूप दृश्य हो भासती है। जैसे स्पन्द से रहित वायु निलक्षरूप होती है और जब स्पन्दरूप होती है तब स्पर्श से भासती है, तैसे ही संवेदन से जो दृश्य भासती है सो वही संवेदन दृश्य हो भासती है।* 🔴 *रामजी ने पूछा, हे भगवन्! जो दृष्टा दृश्यरूप भासती है तो दृश्य बाहर क्यों भासता है?* 🔴 *वशिष्ठजी बोले, हे राम जी! इसी कारण भ्रम कहा है कि अपने भीतर है और बाहर भासती है। जैसे स्वप्ने की सृष्टि अपने ही अन्तर होती है वास्तव से न भीतर है और न बाहर है, आत्मसत्ता ही अपने आप में स्थित है, तैसे ही अब भी ज्यों की त्यों स्थित है, भीतर और बाहर भ्रम से भासती है।* 🔴 *रामजी ने पूछा, हे भगवन्! जो आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है और दृश्यभ्रम से भासती है तो शशे के सींग भी भ्रममात्र हैं वे क्यों नहीं भासते और अहं और त्वं क्यों भासते हैं? भूतों की चेष्टा तो प्रत्यक्ष भासती है?* 🔴 *वशिष्ठजी बोले, हे राम जी! अहं त्वमादिक जगत् भी कल्पनामात्र है। जैसे शशे के सींग कल्पनामात्र हैं और आकाश में दूसरा चन्द्रमा भ्रम से भासता है, तैसे ही यह जगत् भी भ्रममात्र है।* 🔴 *जैसे मृगतृष्णा का जल और संकल्पनगर भ्रममात्र है, तैसे ही यह जगत् भ्रममात्र है, किसी कारण से नहीं उपजा। जैसे स्वप्ने में शशे के सींग नहीं भासते हैं और जगत् भासता है, तैसे ही यह भ्रम है।* *🙏🚩🚩 *" ll जय श्री राम ll "* 🚩🚩🙏*

Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
