
Rama Devi Sahu
188 days ago
जब दूसरा सत्ययुग चल रहा था, उस सतयुग में सारस्वत नामक एक ब्राह्मण हुए, उन्हें सारे वेद वेदाङ्ग पुराण कंठस्थ थे । उत्तम बुद्धि तो ब्राह्मण के पास थी ही, साथ ही उनके पास अचूक सम्पति और सेवा करने वाले अनेको सेवको की भरमार थी ।। एक दिन देवयोग से ब्राह्मण एकांत में बैठकर सोचने लगा, यह धन, यह लाभ हानि, यह तो संसार का चक्र है, यह तो ऐसे ही चलता रहेगा । इन सब नाशवान भोगों को लेकर मैं क्या करूँ ?? ब्राह्मण ने सोचा की क्यो न् अपना सबकुछ पुत्र को सौंपकर सरस्वती नदी के किनारे जप करूँ । जब उन्होंने इस कार्य के लिए भगवान की आज्ञा लेनी चाही तो, अंतरात्मा ने कहा :- पहले पितरो देवताओं, तथा मनुष्यो को संतुष्ठ करो । तब श्राद्ध आदि के द्वारा उस ब्राह्मण ने पितरो को प्रसन्न किया । यज्ञ के द्वारा उन्होंने देवताओं को प्रसन्न किया ।। और अतिथियों का सत्कार करके, दान आदि करके , मनुष्य के साथ मनुष्य सा व्यवहार करके, मनुष्य ऋण उतारा । उसके पश्चात समय आने पर, वह ब्राह्मण पुष्कर तीर्थ चले गए, वहां जाकर उन्होंने नारायणमन्त्र का जाप करना एवं ब्रह्मपार नामक स्रोत जपना शुरू कर दिया ।। नारायणदेव प्रगट हो गए .... बोले "वर मांगो" ब्राह्मण ने कहा ;- मैं आपमे लीन हो जाऊं नारायणदेव मुस्कुराते हुए कहने लगे, अभी तो यह शरीर धारण किये रहो ....लेकिन जो तुमने अपने पितरो को जल ( नार) दिया है, इससे तुम्हारा नाम नारद हो जाएगा । और जब ब्राह्मण के शरीर का अंत हो गया, तब वह ब्रह्मलोक पहुंच गए , और ब्रह्मा ने अपने 10 पुत्रों में नारदजी को भी अपना पुत्र माना, और उसी दिन समस्त देवताओं की सृष्टि हुई .... अपने स्वाध्याय के विषय मे नारदजी कहते है ... मैं ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद , अथर्ववेद- चारों वेदों को जानता हूँ । इनके अतिरिक्त इतिहास पुराण ( ब्राह्मण तथा कल्पादि ) वेदों का वेद - व्याकरण तथा निरुक्त , पित्र्य- वायुविज्ञान , राशि- गणितविद्या , दैव - प्रकृतिविज्ञान , निधि - भूगर्भविद्या , वाकोवाक्य तर्कशास्त्र , एकायन ब्रह्मविज्ञान , इन्द्रिय - विज्ञान , भक्ति शास्त्र , पञ्चभूतज्ञान , धनुर्वेद , ज्योतिष शास्त्र , सर्पविज्ञान , देवजन - विज्ञान- सर्पों को वश में करनेवाली गन्धर्व विद्या को मैं जानता हूँ । इतना मैंने अध्ययन किया है । यह है महर्षि नारद का अद्भुत स्वाध्याय ।। नरस्येद नारं ज्ञानम्-- नरसम्बन्धी ज्ञान अथवा नर-नारायण- से उपलब्ध ज्ञान को 'नार' कहते हैं, नारं ददातीति नारदः- उस ज्ञान का जो दाता है उसका नाम है नारद । नरस्येन नारं नरसम्बन्ध्यज्ञानं, तद् द्यति खण्डयति इति नारदः-- मनुष्य के हृदय में जो अज्ञान है उसे 'नार' कहते हैं, उस अज्ञान को जो मिटा दे, उसका नाश कर दे, उसे नारद कहेंगे । नारद जी ने भक्ति के 84 सूत्र बताएं है .... हम उन 84 सूत्रों को व्याख्या सहित पढ़ेंगे/ सुनेंगे ।

Comments (4)

Rama Devi Sahu
Feb 23, 2026
Ji Namaste 🙏 Radhey Radhey ❤️ Jai Shree Krishna 🙏 Subha Sandhya Vandan Jii 🙏🌹

Rama Devi Sahu
Feb 23, 2026
🙏‼️ Hari Om Tat Sat ‼️🙏 Narayan.... Narayan.... Narayan

Umesh Sharma
Feb 23, 2026
radhe radhe 🌹 Jai shree Krishna 🌹

Srikumar महाराज🇮🇳☸️
Feb 23, 2026
Inka character mujhe bot hi pasand priya hai sara din narayan narayan ka jaap karke bhraman karne 🙏
