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|| श्रीहरि: || परम श्रद्धेय सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दका ---------------------------------------- सर्वत्र परमात्मदर्शन करें ( पोस्ट 6 ) ---------------------------------------- गत पोस्ट से आगे ...... आज आपको एक ऐसी मूल्यवान बात सुनायी जाती है, वह धारण हो जाय तो बेड़ा पार है | बात तो कई बार सुनायी जाती है पर भगवदविषयक बात सदा नयी ही है | मनुष्य की आँख खराब हो जाती है तो डाक्टर चश्मा लगा देता है | हमारे दो आँखें हैं, एक बाहर की एक भीतर की | इसमें दो चश्मे चढाये जायँ तो आनन्द-ही-आनन्द में हर समय मग्न रहे | आपके समझ में आ जाय तो बेड़ा पार है | एक तो बाहर का चश्मा, एक भीतर का चश्मा, दो चश्मे की आवश्यकता है | एक भाई ने पूछा था मेरी ऐसी बुद्धि कैसे हो, जिससे सर्वत्र भगवदबुद्धि हो जाय | उसने हरे रंग का एक चश्मा लगाया | पूछा गया क्या दीखता है ? मुझे सारा संसार हरे-ही-हरे रंग का दीखता है | जिस प्रकार इस चश्मे से सारा संसार हरा-ही-हरा दीखने लगा, उसी प्रकार हरि के रंग का चश्मा चढा लो, फिर सारा संसार हरि के रंग का ही दीखने लगेगा | उपनिषद में भी यह कथा है कि जो कुछ है वह वासुदेव ही है – यह देखना चाहिये | तुलसीदास जी ने भी कहा है – सो अनन्य जांके असि मति न टरइ हनुमंत | मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत || वह मेरा अनन्य भक्त है, जिसकी मति कभी इस बात से विचलित ही नहीं होती कि सारा जगत परमात्मा का स्वरूप है, मैं उनका सेवक हूँ | रात को स्वप्न में अनेक प्रकार का संसार दीखता है | वह दूसरी वस्तु क्या है ? अपना संकल्प ही तो है | इसी प्रकार एक ही चीज अनेक प्रकार के रूपों में दीखती है | स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने अनेक रूप धारण कर लिये हैं | चर-अचर सब भगवान् का ही स्वरूप है | ऐसा समझकर हम व्यवहार करें तो हमारा उद्धार हो सकता है | यह बाहर का चश्मा है | शेष आगामी पोस्ट में | श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका की पुस्तक *शान्ति का उपाय* पुस्तक कोड १७९२, प्रकाशित गीताप्रेस, गोरखपुर से |

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