
Rama Devi Sahu
138 days ago
*अमृत कथा* एक पंडितजी थे। उनके प्रवचन दूर-दूर तक मशहूर थे। एक दिन उन्हें पास के एक गांव के एक मंदिर में पुजारी नियुक्त किया गया। वह गांव जाने के लिए बस में सवार हुए। उन्होंने कंडक्टर को किराया दिया। पैसे लौटाते समय कंडक्टर ने उन्हें 50 रुपए ज्यादा दे दिए। पंडितजी ने नोट रख लिया। उनके मन में यह ख्याल आया कि कंडक्टर अपना 50 रुपए का नोट लेने जरूर आएगा। पांच मिनट बीत गए, लेकिन वह नहीं आया। उन्होंने मन ही मन सोचा कि बस मालिक तो लाखों रुपए कमाता है। यदि मैं 50 रुपए रख भी लूंगा, तो क्या फर्क पड़ेगा? इतने में गांव आ गया। वह बस से उतर तो गए, लेकिन उनका मन नहीं माना। उन्होंने कंडक्टर को 50 रुपए वापस दे दिए। कंडक्टर से उन्होंने कहा कि किराया लौटाते समय तुमने मुझे 50 रुपए ज्यादा दे दिए थे। इस पर कंडक्टर ने जो कहा, वह सुनकर पंडितजी के होश उड़ गए। कंडक्टर ने पूछा, 'क्या आप ही इस गांव के मंदिर के नए पुजारी हैं? उनके हां कहने पर कंडक्टर ने कहा, 'मैं कई दिनों से आपके प्रवचन सुनना चाहता था। आपको बस में देखा, तो मेरे मन में यह जानने की इच्छा हुई कि यदि मैं आपको अधिक पैसे दे दूं, तो आप क्या करते हैं? अब मुझे विश्वास हो गया कि आपके प्रवचन जैसा ही, आपका आचरण है।' पंडितजी ने भगवान का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि हे प्रभु, आपने मुझे बचा लिया। मैंने तो 50 रुपये के लालच में आपकी शिक्षाओं की बोली लगा दी थी। हर कदम पर कर्मों की परीक्षा चलती है। अच्छा आचरण कीजिए।

