
Rama Devi Sahu
209 days ago
पुरी मंदिर के पास रहने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि आप जब चाहें दर्शन कर सकते हैं। और यहीं से एक सवाल मन में आता है—एक ही मंदिर में बार-बार दर्शन करने की ज़रूरत क्या है? उत्तर सरल है। जगन्नाथ मंदिर के चार द्वार हैं, और ये चारों द्वार जीवन के चार लक्ष्यों का प्रतीक हैं—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। हर द्वार से प्रवेश करने का अनुभव अलग है, अर्थ अलग है। सबसे प्रसिद्ध द्वार है सिंहद्वार (पूर्व दिशा)। यही मुख्य प्रवेश द्वार है, यही रथयात्रा का मार्ग है, और अधिकतर श्रद्धालु यहीं से दर्शन करते हैं। सिंहद्वार मोक्ष का प्रतीक माना जाता है—जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति। इसी द्वार की सीढ़ियों में 22वीं सीढ़ी की तीसरी पायदान पर काली शिला है, जिसे यमराज से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि प्रवेश करते समय इस शिला पर पाँव रखना चाहिए और लौटते समय इसे लांघ जाना चाहिए—यह मृत्यु के भय से ऊपर उठने का संकेत है। इसी द्वार से लौटते समय कुछ लोग लुढ़कते हुए बाहर आते हैं, यह विश्वास करते हुए कि इससे पाप धुल जाते हैं। पश्चिम दिशा का द्वार व्याघ्रद्वार (टाइगर गेट) कहलाता है। यह धर्म का प्रतीक है—कर्तव्य, मर्यादा और अनुशासन। यूँ ही नहीं कहा जाता कि धर्म का मार्ग सादा होता है, दिखावे से दूर। दक्षिण दिशा का अश्वद्वार (हॉर्स गेट) जीवन के काम—इच्छा और वासना—का प्रतीक है। मान्यता है कि इस द्वार से प्रवेश करने वाला व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण पाने की प्रार्थना करता है। यह द्वार उतना प्रसिद्ध नहीं, लेकिन अर्थ की दृष्टि से गहरा है—यह याद दिलाता है कि इच्छाएँ बाधा भी बन सकती हैं और साधना भी। उत्तर दिशा का हस्तिद्वार (एलीफेंट गेट) अर्थ—धन और समृद्धि—का प्रतीक है। हाथी वैभव, स्थिरता और शक्ति का संकेत है। यह द्वार उन लोगों से जुड़ा माना जाता है जो जीवन में साधनों की कामना करते हैं, पर उन्हें साधन बनाकर आगे बढ़ना चाहते हैं, लक्ष्य नहीं। सामान्य दर्शन कराने वाले पंडे आपको किसी भी द्वार पर मिल जायेंगे पर यदि विधिवत अनुष्ठान पूजा करानी हो तो उसके लिए आपके जिले के अपने पंडे ही करा सकते हैं. वह प्रायः पश्चिम / दक्षिण द्वार पर मिल जायेंगे. इन चारों द्वारों से दर्शन करना सिर्फ़ परंपरा नहीं, एक यात्रा है—अपने भीतर की। और अंत में एक बात—ये जो तीन तस्वीरें आप देख रहे हैं, ये मंदिर के तीन अलग-अलग पक्षों से ली गई हैं। एक ही मंदिर, लेकिन हर दिशा से उसका अर्थ बदल जाता है। शायद जीवन भी ऐसा ही है। (पण्डा सिस्टम और कर्मकांड की परंपरा पर फिर कभी विस्तार से…)

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