
Rama Devi Sahu
168 days ago
समुद्र का तट शांत था, लहरें धीरे-धीरे किनारे से टकरा रही थीं। पुरी की पवित्र धरती पर भक्तों की भीड़ खड़ी थी, सबकी आँखों में एक ही आशा थी— प्रभु के दर्शन की आशा। सूरज की सुनहरी किरणें समुद्र के जल पर चमक रही थीं, जैसे स्वर्ग से कोई दीप उतर आया हो। लहरों के बीच अचानक एक दिव्य आभा प्रकट होने लगी। जल हिलने लगा, लहरें ऊँची उठने लगीं, और उसी क्षण समुद्र की गहराइयों से प्रकट हुए प्रभु जगन्नाथ। उनका अद्भुत रूप देखकर हर भक्त का हृदय भावविभोर हो उठा। चक्र जैसे बड़े-बड़े नेत्र, करुणा से भरी मुस्कान, और दिव्य तेज से चमकता स्वरूप। समुद्र की लहरें उनके चरणों को स्पर्श करके मानो कह रही थीं— “हे प्रभु, आप ही हमारे स्वामी हैं।” भक्तों के कंठ से एक साथ जयकार उठी— “जय जगन्नाथ! जय जगन्नाथ!” पूरा आकाश उस ध्वनि से गूंज उठा। किसी की आँखों में आँसू थे, किसी के हाथ जुड़े हुए थे, किसी के हृदय में अपार आनंद था। क्योंकि उस दिन भगवान स्वयं समुद्र से प्रकट हुए थे। प्रभु जगन्नाथ की लीला अद्भुत और अनंत है। कभी वे मंदिर में विराजते हैं, कभी रथ पर नगर भ्रमण करते हैं, और कभी भक्तों के प्रेम से समुद्र से भी प्रकट हो जाते हैं। उनकी कृपा से हर दुख दूर हो जाता है, हर अंधेरा मिट जाता है। जो सच्चे मन से पुकारता है, प्रभु उसके पास अवश्य आते हैं। पुरी का वह पावन क्षण आज भी लोगों की स्मृति में जीवित है। समुद्र की लहरें आज भी मानो वही कथा सुनाती हैं— कि जब भक्ति सच्ची होती है, तो भगवान दूर नहीं रहते। वे स्वयं अपने भक्तों के पास आते हैं, और अपने दर्शन से जीवन को धन्य बना देते हैं। जय जगन्नाथ।

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