
Rama Devi Sahu
235 days ago
वह वचन, जिसके टूटते ही अमर हो गया अधूरापन और जगन्नाथ जी का स्वरूप युगों-युगों के लिए वैसा ही ठहर गया ओडिशा के पुरी में निकलने वाली रथयात्रा जितनी विख्यात है, उतनी ही रहस्यमयी है श्रीजगन्नाथ मंदिर की स्थापना-कथा। यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भगवान की इच्छा, मानव की भूल और दिव्य करुणा का अद्भुत संगम है। पुराणों में पुरी को पुरुषोत्तम क्षेत्र, धरती का वैकुण्ठ और नीलांचल कहा गया है—वह भूमि जहाँ स्वयं श्रीकृष्ण जगन्नाथ के रूप में विराजते हैं। कहते हैं, श्रीकृष्ण के गोलोक गमन के बाद उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार अर्जुन ने उनके पौत्र वज्रनाभ के साथ किया। अग्नि में शरीर भस्म हो गया, पर हृदय शेष रह गया। उसी हृदय को जरा बहेलिया—जो अनजाने में कृष्ण-वध का कारण बना था—अपने साथ ले आया। वह उसे श्रीकृष्ण का अंश मानकर विग्रह रूप में पूजने लगा। यही पूजा उसके लिए प्रायश्चित बन गई। जरा के वंशज भील सरदार विश्ववसु और उसका कबीला पीढ़ियों तक उस नीलमाधव विग्रह की गुप्त आराधना करते रहे। उधर, राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में भगवान के दर्शन हुए। उन्हें आदेश मिला कि नीलमाधव को प्रकट कर सम्पूर्ण जग के लिए मंदिर बनाओ। राजा ने ब्राह्मण विद्यापति को नीलमाधव का पता लगाने भेजा। विश्ववसु ने पहले विश्वास नहीं किया, पर अंततः पारिवारिक संबंधों के कारण रहस्य खुल गया। हालाँकि, विग्रह को चोरी से लाने और पत्नी से विश्वासघात का पाप अनजाने में हो चुका था। जब पुरी में मंदिर-स्थापना की तैयारी हुई और नीलमाधव के दर्शन हेतु नगरवासी उमड़े, तब उनका तेज इतना प्रखर था कि कोई नेत्र खोल न सका। राजा व्याकुल हो उठा। अगर आपको कथा संग्रह की पोस्ट पसंद आती है तो आज ही सब्सक्राइब करें कथा संग्रह उसी रात भगवान ने स्वप्न में कहा— “समुद्र तट पर एक काष्ठ-कुंद तैरेगा। उसी से मेरा स्वरूप बनेगा।” अगले दिन सचमुच तट पर विशाल लकड़ी का कुंदा मिला, पर वह किसी से हिला नहीं। तब हनुमान जी का स्मरण हुआ। उन्होंने कहा— “यह कुंदा पाप-भार से जकड़ा है। पहले प्रायश्चित करो।” राजा को तब विद्या-पति का अपराध समझ आया। वे स्वयं विश्ववसु से क्षमा माँगने भील बस्ती पहुँचे। क्षमा, समर्पण और सत्य के स्वीकार के बाद तीनों जब फिर समुद्र तट पहुँचे, तो वही कुंदा भारहीन होकर उठ आया। अब प्रतिमाओं के निर्माण की बारी थी। देशभर से शिल्पी बुलाए गए, पर कोई भी उस काष्ठ को छू तक न सका। हथौड़ी चलती ही नहीं थी। तभी एक दिन संध्या बेला में एक वृद्ध शिल्पी दरबार में आया—झुकी देह, हाथ में लाठी, कंधे पर औज़ारों की गठरी। उसने कहा— “यह मेरी अंतिम साधना है। यदि भगवान की मूर्ति बना सका, तो मुझे मोक्ष मिलेगा।” उस वृद्ध ने बिना देखे ही कक्ष पहचान लिया और बताया कि इस कुंदे से चार प्रतिमाएँ बनेंगी— नीलवर्ण जगन्नाथ, पीतवर्ण सुभद्रा, श्वेतवर्ण बलभद्र, और सुदर्शन चक्र। पर उसकी एक कठोर शर्त थी— 21 दिन तक कक्ष बंद रहेगा। कोई द्वार नहीं खोलेगा। यदि वचन टूटा, तो मूर्तियाँ अधूरी ही रह जाएँगी। निर्माण आरंभ हुआ। दिन-रात छेनी-हथौड़ी की ध्वनि आती रही। शिल्पी न भोजन करता, न विश्राम। पंद्रहवें दिन अचानक सब शांत हो गया। रानी गुंडिचा का हृदय काँप उठा। अगले दिन भी मौन रहा। शंका असह्य हो गई। और फिर—वह क्षण आ गया। द्वार खोल दिया गया। अंदर न शिल्पी था, न कोई गति। बस—तीन अधूरी, पर अपार तेज से दीप्त प्रतिमाएँ। तभी सब समझ गए— वह वृद्ध कोई साधारण मनुष्य नहीं था। वह स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा थे। राजा ने इसे प्रभु की इच्छा मानकर उन अधूरी प्रतिमाओं को ही प्रतिष्ठित किया। कहा जाता है—यह वही स्वरूप है, जो द्वापर में नारद मुनि ने देखा था, जब रासलीला की कथा सुनते हुए कृष्ण, बलराम और सुभद्रा भावविभोर होकर द्रवित हो गए थे। इस प्रकार, एक टूटे हुए वचन से एक अधूरा स्वरूप बना— जो आज भी पूर्ण भक्ति का सबसे जीवंत प्रतीक है। जय जगन्नाथ 🙏

Comments (2)

Rama Devi Sahu
Jan 8, 2026
🙏🌹⭕❗⭕ 🌹🙏 Jai Jagannath 🙏🌹⭕❗⭕🌹🙏

बाल मुकुंद शर्मा
Jan 7, 2026
जय श्री जगन्नाथ।
