
प्रशांत कुमार मिश्रा
22 days ago
रामचरित: उत्तरकाण्ड ; छन्द १५.श्री सहित दिनकर बंस भूषन काम बहु छबि सोहई | नव अम्बुधर बर गात अम्बर पीत सुर मन मोहई || मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे | अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे || अर्थात् तुलसीदासजी कहते हैं कि सीताजी सहित सूर्यवंश के भूषण श्रीरामजी अनेक कामदेवों के समान छवि से शोभायमान हैं | नव मेघ के समान सुन्दर प्रभु के शरीर पर पीताम्बर देवताओं के मन को मोहित कर रहा है | मुकुट , भुजबंद आदि विचित्र आभूषण अंग अंग में सजे हुए हैं , कमल के समान नेत्र हैं , विशाल छाती और भुजाएँ हैं , जो उनके दर्शन करते हैं , वे मनुष्य धन्य हैं | तात्पर्य यह है कि जो लोग जानकीजी सहित देवताओं के मन को मोहित करने वाले मुकुट , भुजबंद आदि विचित्र आभूषणों से युक्त पीताम्बरधारी प्रभु श्रीरामजी के दर्शन करते हैं , वे धन्य हैं | जय जय सीताराम |
Comments (2)

प्रशांत कुमार मिश्रा
Aug 8, 2026
🌹जय 🌹श्री 🌹 राम 🌹

R k jangid phulera Jaipur
Aug 8, 2026
जय श्री राम जी 🚩🌹🙏
