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Rama Devi Sahu

0 hours ago

जब माता लक्ष्मी ने एक असुरराज को बाँधी राखी… 🌸 रक्षाबंधन की वह कथा, जिसमें एक राखी ने स्वयं भगवान विष्णु को वैकुंठ लौटा दिया रक्षाबंधन को हम भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के पर्व के रूप में जानते हैं। लेकिन इस पर्व से जुड़ी एक ऐसी पौराणिक कथा भी है, जिसमें माता लक्ष्मी ने स्वयं एक असुरराज को अपना भाई बनाया और उसकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा था। वह असुरराज थे—महाबली राजा बलि। राजा बलि असुर कुल में जन्मे थे, लेकिन उन्हें अत्यंत दानी, सत्यवादी, वचन के पक्के और भगवान विष्णु के परम भक्त के रूप में भी याद किया जाता है। कथा हमें उस समय में ले जाती है जब राजा बलि ने अपने पराक्रम और सामर्थ्य से तीनों लोकों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि के यज्ञ में पहुँचे। वामन रूप में भगवान ने बलि से केवल तीन पग भूमि माँगी। राजा बलि ने वचन दे दिया। लेकिन वचन मिलते ही वामन का रूप विराट हो गया। पहले पग में उन्होंने पृथ्वी नाप ली, दूसरे पग में आकाश और समस्त लोक। अब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान शेष नहीं था। भगवान ने पूछा— “राजन्, तीसरा पग कहाँ रखूँ?” राजा बलि समझ चुके थे कि सामने स्वयं भगवान विष्णु हैं। उन्होंने बिना किसी भय या छल के अपना सिर झुका दिया और कहा— “प्रभु, तीसरा पग मेरे सिर पर रख दीजिए।” बलि के इस समर्पण और वचनबद्धता से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा बलि को सुतल लोक का राजा बनाया और उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर एक और वचन दिया— वे स्वयं सुतल लोक में रहकर राजा बलि की रक्षा करेंगे। कुछ परंपराओं में वर्णित है कि भगवान विष्णु बलि के द्वारपाल बनकर उसके द्वार पर रहने लगे। यही वह बात थी जिसने पूरी कथा को एक नया मोड़ दिया। भगवान विष्णु अपने धाम वैकुंठ वापस नहीं लौटे। और जब भगवान लंबे समय तक वैकुंठ नहीं पहुँचे, तो माता लक्ष्मी व्याकुल हो उठीं। जिसके साथ वे सदा वैकुंठ में रहती थीं, वही पति अब उनसे दूर सुतल लोक में रह रहे थे। माता लक्ष्मी अपने पति को वापस लाना चाहती थीं। लेकिन समस्या यह थी कि भगवान विष्णु ने राजा बलि को उसकी रक्षा करने का वचन दे रखा था। भगवान अपने भक्त को दिया हुआ वचन कैसे तोड़ सकते थे? तब माता लक्ष्मी स्वयं सुतल लोक पहुँचीं। प्रचलित कथा के अनुसार, उन्होंने साधारण स्त्री/ब्राह्मण स्त्री का रूप धारण किया और राजा बलि के यहाँ पहुँचीं। बलि ने उनका आदर किया और उन्हें अपने घर में स्थान दिया। श्रावण मास की पूर्णिमा आई। यही वह दिन था जिसे आज हम रक्षाबंधन के रूप में मनाते हैं। माता लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा। बलि ने उस स्नेह को स्वीकार किया और माता लक्ष्मी को अपनी बहन मान लिया। उन्होंने कहा— “बहन, तुमने मुझे अपना भाई बनाया है। अब बताओ, मैं तुम्हें क्या उपहार दूँ?” तब माता लक्ष्मी ने अपना वास्तविक परिचय दिया। उन्होंने कहा— “भैया, मैं कोई साधारण स्त्री नहीं हूँ। मैं लक्ष्मी हूँ… और द्वार पर जो खड़े हैं, वे मेरे पति भगवान विष्णु हैं। मैं उन्हें अपने साथ वैकुंठ ले जाना चाहती हूँ।” राजा बलि समझ गए कि जिस अतिथि को उन्होंने बहन का सम्मान दिया था, वह स्वयं माता लक्ष्मी थीं। अब उनके सामने एक ओर भगवान विष्णु को दिया हुआ वचन था और दूसरी ओर अपनी नई बहन की इच्छा। लेकिन बलि ने राखी के रिश्ते की मर्यादा निभाई। उन्होंने माता लक्ष्मी की इच्छा स्वीकार कर ली और भगवान विष्णु को वैकुंठ लौटने की अनुमति दे दी। लेकिन भगवान विष्णु का बलि की रक्षा करने का वचन भी व्यर्थ नहीं जा सकता था। इसीलिए इस कथा की एक परंपरा में बताया जाता है कि राजा बलि की रक्षा का दायित्व ब्रह्मा, शिव और विष्णु ने बाँट लिया। भगवान विष्णु भी एक निश्चित अवधि तक बलि की रक्षा करते रहे और ब्रह्मा तथा शिव ने भी उसकी रक्षा का दायित्व स्वीकार किया। इसी चार महीने की अवधि को चातुर्मास से जोड़ा जाता है। इस तरह माता लक्ष्मी को अपने पति वापस मिल गए और भगवान विष्णु का अपने भक्त राजा बलि की रक्षा करने का वचन भी बना रहा। और यहीं से रक्षाबंधन की कथा में एक बेहद सुंदर संदेश छिपा हुआ है— राखी केवल खून का रिश्ता नहीं बनाती। माता लक्ष्मी और राजा बलि भाई-बहन नहीं थे। फिर भी एक धागे ने उन्हें भाई-बहन के रिश्ते में बाँध दिया। एक ओर बहन

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