
Rama Devi Sahu
95 days ago
॥ प्रभु जगन्नाथ का दिव्य ज्वर ॥ स्नान पूर्णिमा का शुभ दिन आया, एक सौ आठ कलशों से अभिषेक कराया। चंदन, केसर, गंगाजल की धारा बही, हर भक्त की आँखों में भक्ति की ज्योति रही। स्नान के बाद प्रभु को ज्वर ने घेरा, नीलाचल का हर भक्त हो गया अधीरा। मंदिर के द्वार कुछ समय को बंद हुए, प्रेम से भरे सभी हृदय मौन हुए। हे प्रभु! यह कैसी अद्भुत लीला है, जिसमें करुणा और प्रेम की गंगा बहती है। आप जग के पालनहार कहलाते हैं, फिर भी मानव जैसा कष्ट अपनाते हैं। माता लक्ष्मी सेवा में लीन खड़ी हैं, औषधि, काढ़ा और प्रेम से भरी हैं। सेवक श्रद्धा से चरणों को निहारते हैं, भक्ति के आँसू मन ही मन बहाते हैं। पूरा पुरी धाम प्रतीक्षा में डूबा है, हर हृदय आपका दर्शन पाने को आतुर है। घंटियों की ध्वनि भी जैसे धीमी हो गई, भक्तों की साँसें भी मानो थम सी गईं। लेकिन यह ज्वर कोई साधारण नहीं, यह तो प्रेम का संदेश है कहीं। प्रभु बताते हैं अपने हर भक्त को, दुख में भी मत छोड़ो विश्वास को। कुछ दिनों बाद जब स्वस्थ हो जाते हैं, नवयौवन के दिव्य रूप में मुस्काते हैं। उनकी मधुर मुस्कान मन मोह लेती है, हर पीड़ा पल भर में दूर हो जाती है। रथयात्रा का शुभ अवसर जब आता है, पूरा संसार जयघोष से गूँज जाता है। नंदीघोष रथ पर प्रभु विराजते हैं, करुणा के सागर बनकर सबको अपनाते हैं। हे जगन्नाथ! आपका यह दिव्य ज्वर भी, भक्ति का अनुपम संदेश देता है अभी। आप सिखाते हैं कि जीवन में धैर्य रखो, हर कठिन घड़ी में प्रभु पर विश्वास रखो। जो प्रेम से आपका नाम पुकारता है, उसका जीवन स्वयं आप सँवारता है। आपकी कृपा से हर अंधकार मिट जाता है, भक्ति का दीप हर हृदय में जगमगाता है। हे नीलाद्रि के नाथ, शीघ्र स्वस्थ हो जाइए, अपने भक्तों को फिर दर्शन दीजिए। हम सबकी एक ही विनती स्वीकार कीजिए, अपने प्रेम और कृपा से संसार भर दीजिए। जय जगन्नाथ!🙏🌹⭕‼️⭕🌹🙏

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