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Rama Devi Sahu

102 days ago

महाभारत में अर्जुन और मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा की कथा प्रेम, कर्तव्य और वीरता का अद्भुत संगम है। यह प्रसंग अर्जुन के वनवास काल का है, जब वे तीर्थयात्रा करते हुए अनेक राज्यों में गए थे। मणिपुर की धरती पर आगमन पांडवों के बीच बने नियम का उल्लंघन हो जाने के कारण अर्जुन को 12 वर्षों का वनवास स्वीकार करना पड़ा। इस दौरान वे विभिन्न तीर्थों और राज्यों की यात्रा करते हुए पूर्वोत्तर भारत के सुंदर और समृद्ध राज्य मणिपुर पहुँचे। वहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य, घने वन, नदियाँ और पर्वत उन्हें अत्यंत प्रिय लगे। चित्रांगदा से पहली भेंट मणिपुर के राजा चित्रवाहन की एकमात्र संतान थीं राजकुमारी चित्रांगदा। राजा ने उन्हें पुत्र के समान पाला था, क्योंकि उनके राज्य को एक योग्य उत्तराधिकारी की आवश्यकता थी। चित्रांगदा केवल सुंदर ही नहीं थीं, बल्कि धनुर्विद्या, घुड़सवारी और युद्धकला में भी निपुण थीं। वे अक्सर सैनिकों के साथ शिकार और युद्धाभ्यास करती थीं। एक दिन अर्जुन ने उन्हें युद्धाभ्यास करते देखा। उनका साहस, आत्मविश्वास और तेजस्वी व्यक्तित्व देखकर अर्जुन मंत्रमुग्ध हो गए। धीरे-धीरे दोनों के बीच सम्मान और प्रेम का भाव उत्पन्न हुआ। विवाह की शर्त अर्जुन ने राजा चित्रवाहन से चित्रांगदा का हाथ माँगा। राजा ने उनका स्वागत किया, परंतु एक विशेष शर्त रखी। उन्होंने बताया कि उनके वंश को एक वरदान प्राप्त था कि हर पीढ़ी में केवल एक ही संतान राज्य की उत्तराधिकारी बनेगी। चूँकि चित्रांगदा उनकी इकलौती संतान थीं, इसलिए उनका पुत्र ही मणिपुर का अगला राजा बनेगा। राजा ने कहा कि यदि अर्जुन विवाह करना चाहते हैं, तो उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि उनका पुत्र मणिपुर में ही रहेगा और राज्य का उत्तराधिकारी बनेगा। अर्जुन ने बिना संकोच यह शर्त स्वीकार कर ली, क्योंकि वे चित्रांगदा से सच्चा प्रेम करते थे। अर्जुन और चित्रांगदा का जीवन विवाह के बाद अर्जुन लगभग तीन वर्षों तक मणिपुर में रहे। दोनों ने साथ मिलकर राज्य की रक्षा और प्रजा के कल्याण में योगदान दिया। कुछ समय बाद उनके पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम वभ्रुवाहन रखा गया। वचन के अनुसार, अर्जुन ने अपने पुत्र को मणिपुर में ही छोड़ दिया ताकि वह भविष्य में राजा बन सके। इसके बाद अर्जुन ने चित्रांगदा और अपने पुत्र से विदा ली और अपने वनवास की यात्रा आगे बढ़ाई। अश्वमेध यज्ञ और पिता-पुत्र का युद्ध महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया। उस यज्ञ का अश्व अनेक राज्यों में घूमता हुआ मणिपुर पहुँचा। उस समय वभ्रुवाहन मणिपुर के राजा थे। राजधर्म के अनुसार वभ्रुवाहन ने अश्व को रोक लिया। परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि पिता और पुत्र के बीच युद्ध हुआ। वभ्रुवाहन ने अर्जुन को पहचान नहीं पाया और अपने पराक्रम से उन्हें युद्ध में पराजित कर दिया। बाद में नागकन्या उलूपी के प्रयासों से अर्जुन पुनः जीवित हुए और तब पिता-पुत्र का मिलन हुआ। यह प्रसंग महाभारत के सबसे भावनात्मक क्षणों में से एक माना जाता है। इस कथा का संदेश चित्रांगदा और अर्जुन की कहानी केवल प्रेम कथा नहीं है। यह कर्तव्य, वचनपालन, नारी-शक्ति और त्याग की भी कहानी है। चित्रांगदा महाभारत की उन वीरांगनाओं में गिनी जाती हैं जिन्होंने युद्धकला और शासन दोनों में अपनी अद्भुत क्षमता दिखाई। #कृष्णा

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Comments (2)

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

May 20, 2026

Good Evening Ji 🌹

Rakesh Kumar

Rakesh Kumar

May 20, 2026

good afternoon ji 🙏