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कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुन्धरा भाग्यवती च तेन । विमुक्तिमार्गे सुखसिन्धुमग्नं लग्नं परे ब्रह्मणि यस्य चेतः ॥ [ स्कन्दपुराण - माहेश्वरकुमारिकाखण्ड ५२.३८ ] कुलं पवित्रं जननी कृतार्था विश्वम्भरा पुण्यवती च तेन । अपारसच्चित्सुखसागरेऽस्मिन् लीनं परे ब्रह्मणि यस्य चेतः ॥ [ सूतसंहिता २ ज्ञानयोग०२०.४५ ] ~ "जिसका चित्त मोक्षमार्गमें सन्निहित होकर इस अपार सच्चित्सुखसिन्धु परब्रह्ममें निमग्न हो गया , उसका कुल पवित्र हो गया , उसकी जननी कृतार्थ हो गयी एवं उसे प्राप्तकर पृथ्वी भी पुण्यवती हो गयी ॥ " राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥ [ श्रीमद्भगवद्गीता ९.२ ] ~ " आत्मज्ञान सर्वविद्याओंमें राजा है , यह सर्व गोपनीयोंमें श्रेष्ठ है , अनेक जन्मार्जित शुभाशुभादि कर्मोंका क्षणमात्रमें दाहक होनेसे परम् पवित्र है , यह सुखादिके तुल्य प्रत्यक्ष अनुभाव्य है एवं परम् धर्मस्वरूप है । ऐसा होनेपर भी सुसम्पाद्य है । यह मोक्षरूप अक्षय फलप्रद होनेके कारण अव्यय है ॥ " कृतयुगमें एक वेद , एक मन्त्र , एक धर्मके सिद्धान्तका सर्वतोभावेन निर्वाह होता था , जैसा कि महाभारतके अनुशीलनसे सिद्ध है ~ एकदेवसदायुक्ता एकमन्त्रविधिक्रियाः । पृथग्धर्मास्त्वेकवेदा धर्ममेकमनुव्रताः ॥ [ महाभारत - वनपर्व १४९.२० ] ~ " सत्ययुगमें सब एक परमात्मदेवको ही भजनीय समझकर उनमें ही चित्त लगाये रहते थे , एकमात्र उन्हींके प्रणवप्रधान मन्त्रका जप करते थे तथा विधिसम्मतक्रियाका उन्हींके लिये सम्पादनकर उन्हींके प्रति क्रियाकलापको समर्पित करते थे । धर्म एवं ब्रह्मकी सिद्धिमें एकमात्र वेदको प्रमाण मानते हुए ही अपने अपने वर्ण व आश्रमके अनुरूप विविध धर्मोंका अनुष्ठान करते थे । ऐसा होनेपर भी सब वेदसम्मत सनातन धर्मका ही अनुगमन करनेवाले थे ॥ " इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा घृणा । अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥ [ महाभारत - उद्योगपर्व ३५. ५६ ] ~ " यज्ञ, अध्ययन , दान , तप , सत्य , क्षमा , दया एवं लोभका परित्याग - ये धर्मके आठ मार्ग अर्थात् हेतु बताये गये हैं ॥ " तत्र पूर्व चतुर्वर्गो दम्भार्थमपि सेव्यते । उत्तरश्च चतुर्वर्गो नामहात्मासु तिष्ठति ॥ [ महाभारत - उद्योगपर्व ३५. ५७ ] ~ " इनमेंसे यज्ञ , अध्ययन , दान , तप इन चारोंका दम्भी भी सेवन कर सकता है ; परन्तु सत्य , क्षमा , दया तथा अलोभ ये अन्तिम चार जो महात्मा नहीं हैं , उनमें रह ही नहीं सकते ॥ " इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः । अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टाविधः स्मृतः ॥ [ महाभारत - वनपर्व २. ७५ ] ~ " यज्ञ , अध्ययन , दान , तप , सत्य , क्षमा , मन एवं इन्द्रियोंका संयम तथा लोभका परित्याग ये धर्मके आठ मार्ग अर्थात् हेतु बताये गये हैं ॥ " अत्र पूर्वश्चतुर्वर्गः पितृयाणपथे स्थितः । कर्तव्यमिति यत् कार्यं नाभिमानात् समाचरेत् ॥ [ महाभारत - वनपर्व २. ७६ ] ~ " इनमें पहले बताये हुए यज्ञ , अध्ययन , दान एवं तप - संज्ञक धर्म पितृयानके मार्गमें स्थित हैं अर्थात् इन चारोंका सकामभावसे अनुष्ठान करनेपर ये पितृयानमार्गसे स्वः पर्यन्त उत्क्रमणमें हेतु हैं । अग्निहोत्र एवं सन्ध्योपासनादि कर्त्तव्य कर्मोंका सम्पादन निरभिमान होकर करना चाहिये ॥ " उत्तरो देवयानस्तु सद्भिराचरितः सदा । अष्टाङ्गेनैव मार्गेण विशुद्धात्मा समाचरेत् ॥ [ महाभारत - वनपर्व २. ७७ ] ~ " अन्तिम सत्य , क्षमा , दम तथा अलोभ संज्ञक धर्म देवयानमार्गसे सत्यलोकपर्यन्त उत्क्रमणमें हेतु हैं । सत्पुरुष सदा उसी मार्गका आश्रय लेते हैं । वक्ष्यमाण सम्यक् सङ्कल्पादि संज्ञक अष्टाङ्ग‌मार्गसे निरभिमानता एवं निष्कामतापूर्वक ही पुनर्भवके निवारक परम् कल्याणकारक सत्यादि धर्मोंका परिपालन करे ॥ " यज्ञो दानमध्ययनं तपश्च चत्वार्येतान्यन्ववेतानि सद्धिः । दमः सत्यमार्जवमानृशंस्यं चत्वार्येतान्यनुयान्ति सन्तः ॥ [ महाभारत - उद्योगपर्व ३५.५५ ] ~ " यज्ञ , दान , शास्त्राध्ययन तथा तप ये चार सज्जनोंके साथ नित्य सम्बद्ध हैं एवं मन व इन्द्रियोंका निग्रह , सत्य , सरलता तथाकोमलता अर्थात् बाह्याभ्यन्तर मृदुता इन चारोंका सन्तवृन्द अनुसरण करते हैं ॥ "

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