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Rama Devi Sahu

182 days ago

राधामयी रहस्य * वृंदावन की एक शांत संध्या थी... यमुना के जल में चाँद की परछाईं झिलमिला रही थी, मंद पवन में कदंब की सुगंध बह रही थी, और राधा का मन… अपने श्याम के ध्यान में विलीन था। वो बांसुरी की ध्वनि नहीं सुन पा रही थीं, मन व्याकुल था, नेत्र नीर से भीगे हुए। चारों ओर मौन था, पर उस मौन में राधा का हृदय पुकार रहा था — “श्याम… आज तुम मौन क्यों हो?” उसी क्षण वृंदावन की भूमि पर हल्की कम्पन हुई, पवन थम गया, पत्ते रुक गए, और कहीं दूर से वही मधुर बांसुरी बज उठी… जैसे स्वयं ब्रह्मांड ने श्वास ले ली हो। राधा ने नेत्र उठाए — और देखा, यमुना तट पर श्रीकृष्ण खड़े हैं, होंठों पर वही बाँसुरी, और नेत्रों में वही अनंत प्रेम का सागर। श्याम मुस्कुराए — “राधे, तुमने मुझे बुलाया, तो मैं कैसे न आता? पर आज मैं तुम्हारे पास कुछ देने नहीं, बल्कि कृपा का अर्थ बताने आया हूँ।” राधा ने नम्रता से कहा — “कृपा? क्या वह भी प्रेम से अलग है, कान्हा?” कृष्ण ने उत्तर दिया — “प्रेम तो मेरा स्वरूप है राधे, पर कृपा… तुम्हारा रूप है। जब तुम किसी पर दया करती हो, जब किसी के दुख को अपने हृदय में लेती हो, वहीं से मेरी कृपा प्रकट होती है। राधा बिना कृष्ण अपूर्ण है, पर राधा की करुणा बिना कृष्णकृपा भी अधूरी है।” इतना कहकर कृष्ण ने बांसुरी होठों से लगाई — उस स्वर में ऐसी करुणा थी कि वृंदावन की हर गोपी, हर पत्ता, हर जलकण भावविह्वल हो उठा। यह वह क्षण था जब कृष्णकृपा राधा के हृदय के आँसू से बह निकली। राधा के नेत्रों से आँसू गिरे — पर वे आँसू नहीं थे, वो कृपा के बीज थे, जो आज भी हर भक्त के हृदय में अंकुरित होते हैं जब वह “राधे कृष्ण” का नाम प्रेम से लेता है। यही है कृष्णकृपा की लीला — जहाँ प्रेम और करुणा एक होकर भक्त के भीतर दिव्यता को प्रकट करते हैं। 🌹🙏🏻 जय श्री राधे कृष्णा 🙏🏻🌹

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