
Rama Devi Sahu
62 days ago
भगवान जगन्नाथ हर वर्ष बीमार क्यों पड़ते हैं? एक अद्भुत और भावुक रहस्य! 🛕✨ सनातन धर्म की लीलाएं अत्यंत गूढ़ और प्रेम से भरी हैं। उड़ीसा के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में हर साल एक ऐसा समय आता है, जब ब्रह्मांड के स्वामी भगवान जगन्नाथ 108 घड़े जल से स्नान (स्नान यात्रा) करने के बाद बीमार पड़ जाते हैं। अगले 15 दिनों तक उन्हें एकांत में रखा जाता है, उनके दर्शन बंद हो जाते हैं और छप्पन भोग की जगह उन्हें आयुर्वेदिक काढ़ा पिलाया जाता है। इस 15 दिन की अवधि को 'अनवसर काल' कहा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान आखिर बीमार क्यों पड़ते हैं? इसके पीछे एक अत्यंत भावपूर्ण कथा है: 👇 🌺 भक्त माधव दास जी और प्रभु का प्रेम पुरी में श्री माधव दास जी नाम के एक अनन्य भक्त रहते थे। उनका संसार में कोई नहीं था। वे अकेले रहते और अपना सारा समय प्रभु श्री जगन्नाथ जी की भक्ति में बिताते थे। वे प्रभु को ही अपना सखा मानते थे। एक बार माधव दास जी को गंभीर अतिसार (उल्टी-दस्त) का रोग हो गया। वे इतने दुर्बल हो गए कि अपनी जगह से उठ भी नहीं सकते थे। लोगों ने मदद की पेशकश की, लेकिन उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि "मेरे जगन्नाथ ही मेरी रक्षा करेंगे।" जब उनकी दशा इतनी बिगड़ गई कि उन्हें अपने मल-मूत्र का भी होश नहीं रहा, तब उनके कष्ट को देखकर स्वयं श्री जगन्नाथ जी सेवक का रूप धारण कर उनके घर पहुंच गए। प्रभु ने अपने हाथों से माधव दास जी के गंदे वस्त्र धोए, उनके शरीर को स्वच्छ किया और दिन-रात उनकी ऐसी सेवा की, जो शायद कोई अपना सगा भी न कर सके। 🥺 "प्रभु, आपने रोग ही क्यों नहीं दूर कर दिया?" जब माधव दास जी को होश आया और उन्होंने अपने प्रभु को सेवक के रूप में देखा, तो वे रो पड़े। उन्होंने पूछा— "प्रभु! आप तो त्रिभुवन के स्वामी हैं। आप मेरी सेवा कर रहे हैं? आप चाहते तो मेरा रोग क्षण भर में दूर कर सकते थे!" तब भगवान ने जो उत्तर दिया, वह कर्म और प्रारब्ध का सबसे बड़ा सिद्धांत है: "माधव! मुझसे मेरे भक्तों का कष्ट नहीं देखा जाता। लेकिन जो प्रारब्ध (कर्म फल) है, उसे भोगना ही पड़ता है। यदि मैं तुम्हारा रोग अभी काट दूं, तो इसे भोगने के लिए तुम्हें एक और जन्म लेना पड़ेगा, और मैं नहीं चाहता कि मेरा भक्त फिर से जन्म-मरण के चक्र में फंसे।" 🌿 15 दिन का रोग और भगवान का काढ़ा प्रभु ने आगे कहा, "तुम्हारे प्रारब्ध में अभी 15 दिन का रोग और बचा है। मैं तुम्हारा यह 15 दिन का रोग अपने ऊपर ले लेता हूँ।" भगवान ने अपने भक्त का वह रोग स्वयं ग्रहण कर लिया। उसी समय से यह परंपरा चली आ रही है। आज भी भक्त की उसी पीड़ा को अपने ऊपर लेने के कारण भगवान जगन्नाथ हर साल 15 दिन के लिए बीमार पड़ते हैं। इस दौरान: मंदिर के पट 15 दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं। भगवान की रसोई बंद रहती है और छप्पन भोग नहीं लगता। प्रभु को केवल आयुर्वेदिक काढ़े, फलों के रस और छेने का भोग लगाया जाता है। रोज वैद्य आकर प्रभु की जांच करते हैं और उन्हें शीतल लेप लगाया जाता है। 15 दिन विश्राम और उपचार के बाद, जब प्रभु पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं, तब अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए उनकी भव्य 'रथ यात्रा' निकलती है! रथ यात्रा का वह दिन प्रभु के स्वस्थ होने का और भक्तों के मिलन का सबसे बड़ा उत्सव होता है। अपने भक्त के लिए स्वयं कष्ट सहने वाले ऐसे कृपालु हैं हमारे जगन्नाथ जी! जय जगन्नाथ! 🙏
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